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Published on Jun 22, 17 |     Story by |     Total Views : 36 views

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जीत तो ठीक है, अब जिम्मेदारी भी निभाइए

लगभग 10 साल की विरोधी सत्ता को हराकर, भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली के एमसीडी चुनाव में अपनी जीत का परचम लहराया है. राज्य में पांच नगर निकायों में से तीन, पूर्व दिल्ली नगर निगम, उत्तर दिल्ली नगर निगम और दक्षिणी दिल्ली नगर निगम 23 अप्रैल 2017 को चुनाव में शामिल हुए.
दिल्ली एमसीडी में भाजपा की असाधारण जीत हुई. आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बुरी हार हुई. भाजपा नें 270 वार्डों में से 267 (2 वार्डों पर चुनाव रद्द) पर अपने उम्मीदवारों को उतारा था. क्या इसका मतलब यह है कि आम आदमी पार्टी अपने वादों को पूरा करने में असफल रही और दिल्ली के लोगों द्वारा उस पर भरोसा रखने वाले विश्वास को बरकरार नहीं रख पाई? इस प्रश्न का उत्तर बहस के लिए है. दिल्ली एमसीडी चुनाव 2017 में भाजपा नें कुल 68 प्रतिशत सीटें जीतीं हैं जबकि दिल्ली एमसीडी चुनाव 2012 में भाजपा केवल 51 प्रतिशत सीटें ही प्राप्त कर पाई थी.
इन नतीजों से साफ जाहिर है कि विपक्ष ने बीजेपी पर एमसीडी को लेकर जो भी आरोप लगाये थे, दिल्ली की जनता ने उसे नकारते हुए बीजेपी को जबरदस्त बहुमत दिया है. लेकिन, एक सवाल देश को ले कर है. केन्द्र सरकार को तीन साल हो गए है. ऐसे में कुछ आकड़ों पर गौर करना जरूरी है. देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के ताजा आंकड़े ने सरकार के दावों पर सवालिया निशान लगा दिया है. केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय के अनुसार मार्च में खत्म हुई वित्त वर्ष 2016-17 की चौथी तिमाही के दौरान जीडीपी ग्रोथ 6.1 फीसदी पर आ गई. इसके पहले वाली तिमाही में यह 7.1 प्रतिशत थी. इस गिरावट के लिए नोटबंदी को जिम्मेदार माना जा रहा है. सरकार ने पिछले साल नवंबर में पांच सौ और एक हजार के नोटों को चलन से बाहर कर दिया था, जिसका सीधा असर ग्रोथ रेट पर पड़ा क्योंकि इस दौरान आर्थिक गतिविधियों को गहरा झटका लगा. नकदी के अभाव में लोगों ने खरीदारी कम कर दी, जिससे बाजार में मांग एकदम गिर गई. यही नहीं, कई छोटे-मोटे कारोबार तो समाप्त ही हो गए. अर्थव्यवस्था अब भी पूरी तरह पटरी पर नहीं लौट पाई है.
फिर भी, वित्त मंत्री नोटबंदी के महिमामंडन में जुटे हैं. यह सही है कि इसके कुछ सकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिले. कुछ काला धन बाहर आया, बैंकों के पास नकदी बढ़ी. सबसे बड़ी बात यह कि इससे टैक्स के दायरे में आने वालों की संख्या बढ़ी. लेकिन इससे अर्थव्यवस्था को जो झटके लगे, उसका आकलन भी जरूरी है. आगे की नीति तैयार करने में इससे सहूलियत होगी. तीन साल पहले तक देश की अर्थव्यवस्था पर निवेशकों को भरोसा नहीं था, लेकिन एनडीए सरकार ने अपने अब तक के कामकाज में अर्थव्यवस्था की विश्वसनीयता दोबारा बहाल करने में सफलता हासिल की, जिसके चलते विदेशी निवेशक दोबारा भारत की ओर रुख कर रहे हैं.
ये बातें आंशिक रूप से सही हो सकती हैं, लेकिन इकॉनमी को संपूर्णता में देखना होगा. नोटबंदी के बाद कृषि को छोडक़र अन्य सभी क्षेत्रों में गिरावट आई. अगले एक-दो महीनों में ही जीएसटी अमल में आने जा रहा है. इस नई टैक्स प्रणाली में सरकार को उन सेक्टर्स के लिए विशेष उपाय करने होंगे, जिन पर नोटबंदी की सबसे ज्यादा मार पड़ी है. अर्थव्यवस्था की जमीनी सचाई को स्वीकार करने से आगे की राह आसान होगी.

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