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Published on Apr 25, 14 |     Story by |     Total Views :

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सदी का सबसे बड़ा घोटाला

40प्राकृतिक गैस देश का संसाधन है. जनता के हित के लिए इसका इस्तेमाल होना चाहिए. लेकिन, मुकेश अंबानी के फायदे के लिए इसका दाम लगातार बढ़ाया जा रहा है. हाल में, इसकी कीमत 4.2 डॉलर प्रति एमएमबीयूटी से बढ़ाकर 8.4 डॉलर प्रति एमएमबीयूटी कर दी गई. कीमत बढ़ाए जाने में रंगराजन समिति की सिफारिशों को भी आधार बनाया गया है. रंगराजन समिति ने प्राकृतिक गैस (एनजी) के दाम तय करने में एलएनजी इंपोर्ट, यूएस हेनरी हब, यूके की एनबीपी और जापान के जीसीसी लिंक्ड प्राइस (इन सभी जगहों पर एलएनजी के दाम) के औसत के आधार पर भारत में उत्पादित नेचुरल गैस की कीमत तय करने की सिफारिश की. अब समझने वाली बात यह है कि क्या देश में उत्पादित प्राकृतिक गैस की कीमत तय करने के लिए एलएनजी के दाम को आधार बनाया जाना उचित है. यह उसी तरह है, जैसे क्रूड ऑयल (कच्चे तेल) की कीमत का आधार पेट्रोल और डीजल की कीमत के बाजार भाव को बना दिया जाए.

एलएनजी (लिक्विपाइड नेचुरल गैस) और एनजी (नेचुरल गैस) उत्पादन की कीमत में बहुत अंतर है. फिर, एनजी की कीमत तय करने में एलएनजी को आधार कैसे बनाया जा सकता है. प्राकृतिक गैस को जमीन से निकाला जाता है, जिसमें मिथेन (ष्ट1), इथेन (ष्ट2), प्रोपेन(ष्ट3), ब्यूटेन(ष्ट4)  और लिक्यूड (ष्ट5+). होते हैं. एनजी को जब एनएनजी में बदला जाता है, तो इससे इथेन (ष्ट2), प्रोपेन(ष्ट3), ब्यूटेन(ष्ट4) और लिक्यूड (ष्ट5+) को इससे निकाल दिया जाता है. सिर्फ मिथेन को लिक्विफाइड फॉर्म में रखा जाता है. इसका प्रोसेसिंग करके मिथेन को अलग किया जाता है, जिसका उपयोग उर्वरक उद्योग और बिजली बनाने के लिए किया जाता है. प्रोपेन और ब्यूटेन का उपयोग एलपीजी बनाने के लिए किया जाता है. यह प्रोसिसिंग उसी तरह का होता है, जैसे क्रूड ऑयल का प्रोसेसिंग करके एलपीजी, केरोसिन और डीजल बनाया जाता है. जिस तरह क्रूड ऑयल (कच्चा तेल) की कीमत एलपीजी, डीजल और केरोसिन से काफी कम होती है, ठीक उसी तरह एनजी (प्राकृतिक गैस) की कीमत भी एलएनजी (लिक्विफाइड नेचुलर गैस) से काफी कम होता है. ऐसे में एलएनजी की कीमत को देश में उत्पादित नेचुरल गैस की कीमत का आधार बनाया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है. जब विश्व के किसी देश में इस तरह से गैस की कीमत का निर्धारण नहीं किया जाता है, तो भारत में ऐसा क्यों? इस थोथे तर्क का कोई मतलब नहीं है कि इससे पीएसयू को फायदा होगा, क्योंकि पीएसयू की स्थिति से सभी लोग वाकिफ हैं. सरकार का तर्क जो भी हो, लेकिन वास्तविकता तो यही है कि जनता की कीमत पर मुकेश अंबानी को फायदा दिया जा रहा है. आधारहीन है नेचुरल गैस की कीमत बढ़ाना नेचुरल गैस का उत्पादन करने वाला कोई देश अपनी घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एलएनजी का इस्तेमाल नहीं करता है, बल्कि पाइप द्वारा नेचुरल गैस को उन जगहों पर भेजता है, जहां इसकी जरूरत होती है. जिन देशों के पास नेचुरल गैस नहीं है, वे ही एलएनजी के फॉर्म में इसका उपयोग करते हैं,

नेचुरल गैस को ड्रीलिंग करके नकाला जाता है. यह रॉ मटेरिलयल होता है.

प्रोसेसिंग और लिक्विफाइड कर इसे एलएनजी बनाया जाता है.

दोनों की कीमतों में बहुत ज्यादा अंतर है.

एलएनजी की कीमत के आधार पर नेचुरल गैस की कीमत का निर्धारण क्यों?

आरआईएल (मुकेश अंबानी की कंपनी) केजी बेसिन से गैस निकाल रहा है.

सरकार की मंशा मुकेश अंबानी को फायदा पहुंचाना

गैस उत्पादक देश खुद एलएनजी का इस्तेमाल नहीं करते.

मध्यपूर्व के देशों में नेचुरल गैस उत्पादन की कीमत 0.5 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू है.

जापान में इसकी कीमत 5.80 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू हो जाती है.

मध्यपूर्व के नेचुरल गैस को एलएनजी बनाकर जापान के तट तक पहुंचाने में इसकी कीमत 12 गुणा बढ़ जाती है

क्योंकि उन्हें नेचुरल गैस का आयात करना पड़ता है. जिन देशों में नेचुरल गैस का उत्पादन होता है, वहां अपने धरेलू उपभोक्ताओं को यानी बिजली एवं उर्वरक उत्पादन कंपनियों को एलएनजी नहीं, बल्कि पाइप से नेचुरल गैस (पीएनजी) दिया जाता है. कतर, ओमान, सऊदी अरब, ब्राजील आदि देशों में सरकार प्राकृतिक गैस के दाम का निर्धारण करती है. अमेरिका जैसे कुछ देशों में बाजार इसकी कीमत तय करता है. भारत में भी सरकार ही नेचुरल गैस की कीमत तय करती है, लेकिन कीमत तय करने का आधार बहुत संदिग्ध है. रंगराजन समिति ने भी जेसीसी जापान, अमेरिका, ब्रिटेन और आयातित एलएनजी को भारत में प्राकृतिक गैस की कीमत तय करने का आधार बनाया. अगर एलएनजी और नेचुरल गैस की कीमतों के बीच के अंतर को समझें, तो साफ हो जाता है कि भारत में यह कीमत किसी भी तरह से उचित नहीं है. इससे केजी-बेसिन से गैस निकालने वाली मुकेश अंबानी की कंपनी आरआईएल ही फायदे में रहेगी. एक उदाहरण लेते हैं, जापान का. जापान में गैस के भंडार नहीं हैं और वहां इसका आयात करना पड़ता है. यानी एलएनजी का उपयोग जापान करता है. वह मध्यपूर्व एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया से यह गैस आयात करता है. मध्यपूर्व एशिया में नेचुरल गैस के उत्पादन यानी कुएं से निकालने के समय इसकी कीमत 0.5 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू होती है. एलएनजी बनाकर जब यह जापान पहुंचता है, तो बिना कस्टम ड्यूटी चुकाए इसकी कीमत 5.80 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू हो जाती है. यानी दाम में करीब 12 गुणा का अंतर हो जाता है. इसी तरह दक्षिण पूर्व एशिया में इसके उत्पादन की कीमत 1 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू है. जापान पहुंचने पर इसी नेचुरल गैस के एलएनजी की कीमत 5.5 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू हो जाती है. इसकी कीमत थोड़ी कम है, जिसका कारण शिपिंग कॉस्ट का कम होना है. मध्यपूर्व से गैस मंगाने में किराया जहां 1.5 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू होता है, वहीं दक्षिण पूर्व से मंगाने में यह घटकर 0.70 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू रह जाता है. एलएनजी की कीमत को तय करने का एक सही मानदंड जेसीसी ( जापान क्रूू ड कॉकटेल) के दाम को माना जाता है. अगर भारत भी इसी को आधार माने, तो यह कहां तक उचित होगा. इसे तो कतर, ओमान, ईरान आदि देशों की तरह अपने उपभोक्ताओं को सामान्य दर पर गैस देना चाहिए. प्राकृतिक गैस देश की संपत्ति है. इस पर सबसे पहला अधिकार यहां की जनता का है. सरकार इसकी कीमत तय करती है, तो उसे जनता का ख्याल करना चाहिए न कि मुकेश अंबानी का, जिनकी कंपनी केजी बेसिन से प्राकृतिक गैस निकाल रही है. सरकार की नीति तो यही होना चाहिए कि किसी कंपनी को गैस उत्पादन के लिए बुलाए, उससे उत्पादन की कीमत तय करे और उत्पादित गैस को राष्ट्र की संपत्ति बनाए. इसकी कीमत जनता के हितों को ध्यान में रखकर तय करे. प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल ऊर्जा और बिजली उत्पादन के लिए किया जाता है, जो जनता से स्पष्ट तौर पर जुड़ा हुआ है. भारत सरकार ऊर्जा सुरक्षा के नाम पर एक ओर तो इन गैस उत्पादक कंपनियों को महंगे दाम पर गैस बेचने के लिए गैस की कीमत बढ़ाती है, तो दूसरी ओर बिजली तथा उर्वरक पर सब्सिडी देती है. हर तरफ से उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाया जा रहा है और वह भी आम लोगों की कीमत पर.

हालांकि, संसद की स्थाई समिति (वित्त) की रिपोर्ट में तो प्राकृतिक गैस की कीमत बढ़ाए जाने का विरोध किया जाता है. इस समिति के अध्यक्ष भाजपा नेता यशवंत सिन्हा हैं. लेकिन, संसद में इसका विरोध करना न तो भाजपा सही समझती है और न ही सपा, बसपा, जद (यू), राजद, डीएमके या अन्य कोई राष्ट्रीय या क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी. सभी दलों की सरकार का मूक समर्थन प्राप्त है. आखिर हो भी क्यों नहीं, मामला रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड का है, जो पक्ष और विपक्ष में बैठे सारे राजनीतिक दलों को प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर फंडिंग करता है. कुछ नेताओं ने व्यक्तिगत प्रयास किया है. इसमें एक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद गुरूदास दास गुप्ता हैं. इन्होंने प्राकृतिक गैस की कीमत बढ़ाने के सरकार के फैसले के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल

(जनहित याचिका) दायर किया है. आखिर अंबानी, अडानी, जिंदल, वेदांता आदि के प्रश्नों पर विपक्षी दल भी चुप क्यों रहते हैं. देश के प्राकृतिक संसाधनों को कौड़ी के भाव से बांटा जा रहा है, जिस पैसे का उपयोग जनता के लिए किया जाना चाहिए था, वह इन उद्योगपतियों, अधिकारियों और नेताओं की जेब में जा रहा है.

मीडिया क्यों नहीं उठाता इस मुद्दे को: इतने बड़े मामले को मीडिया में जगह नहीं दी जाती है. क्यों नहीं मीडिया में इसपर विस्तृत चर्चा कराई जाती है, ताकि लोगों को इस बात की जानकारी हो कि बिजली और उर्वरक के दामों में वृद्धि का एक सबसे बड़ा कारण सरकार और अंबानी का गठजोड़ है और इसे दूसरे राजनीतिक दलों का मौन सहमति प्राप्त है. मीडिया इन मुद्दों से क्यों भाग रहा है, जबकि छोटे-मोटे भ्रष्टाचार के मुद्दे को इतना बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है, जैसे वही देश की जनता की समस्या की जड़ है. मीडिया के द्वारा इन मुद्दों को नहीं उठाने के दो कारण हैं, एक तो अधिकांश बड़े चैनलों और अखबार में इन पूंजीपतियों की हिस्सेदारी है और दूसरा ये विज्ञापन के बहुत बड़े स्रोत हैं.

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