All Rights

Published on Jun 18, 17 |     Story by |     Total Views : 127 views

Pin It

Home » Issue, Magazine Issues » माओवादी हिंसा : नक्सलवाद का स्थाई हल खोजे सरकार

माओवादी हिंसा : नक्सलवाद का स्थाई हल खोजे सरकार

moist attackछत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 26 जवानों के शहीद होने के बाद सरकार ने वही सब कहा जो वह अक्सर दोहराती आई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और रमन सिंह ने कहा कि शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। गृह मंत्री ने एक और बात कही कि अगर जरूरत पड़ी तो नक्सलियों से निपटने के लिए रणनीति बदली जाएगी। सुनने में बात मार्के की लगती है मगर है नहीं। बड़े नक्सली हमलों के बाद ऐसे औपचारिक बयान सुनने की जनता को आदत हो गई है। लेकिन इसके साथ ही लोगों को कुछ प्रश्न जरूर परेशान करते हैं कि आखिर यह समस्या सुलझ क्यों नहीं रही? इतना खर्च करने और तमाम सुरक्षा बल लगाने के बाद भी माओवादी बचे क्यों हुए हैं? उन्हें कौन प्रशिक्षण और पैसे दे रहा है? क्या वे भारतीय राष्ट्र-राज्य से भी ज्यादा ताकतवर हैं?

सच्चाई यह है कि नक्सलवाद का स्थाई हल ढूंढने को लेकर न तो केंद्र सरकार गंभीर है और न ही राज्य सरकारें। केंद्र सरकार यह कहकर निश्चिंत हो जाती है कि उसका काम केंद्रीय बल भेजना है, माओवादियों से निपटने का बाकी काम तो राज्य सरकारों का है। जहां तक राज्य सरकारों की बात है तो इस समस्या को सुलझाने के सबके अपने-अपने तरीके हैं। कुछ राज्य सरकारों पर तो इसका अपने हित में लाभ उठाने का आरोप भी लगता रहा है।

सडक़ भी है मुद्दा

नक्सल समस्या का स्थाई हल खोजना किसी के अजेंडे में शायद इसलिए नहीं है कि इसकी आग में देश का संपन्न और मध्यवर्ग नहीं झुलसता। यह देश के एक कोने में हाशिए पर सिमटे रहने वालों की समस्या है, जिससे देश के भद्रलोक को कोई खास परेशानी नहीं होती। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने तो यहां तक कह दिया कि नक्सली गरीब और आदिवासियों के सबसे बड़्रे दुश्मन हैं। शहीद होने वाले सारे जवान गरीब परिवारों के होते हैं। सीआरपीएफ में भर्ती होना उनकी मजबूरी है। लेकिन नक्सली भी कोई अमीर या रसूख वाले घराने, मंत्री, अफसर, नेता, बड़े व्यवसायी और देश की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करनेवाले कॉरपोरेट परिवारों के नहीं हैं। तो मरने वालों और मारने वालों में कसूरवार कौन है? ऐसे संघर्षों में दोनों तरफ से खामियाजा गरीब परिवार ही भुगतता है। ये वे लोग हैं, जो हेलिकॉप्टर और विमान या तो चुनाव के समय देखते हैं अथवा तब, जब उनके शहीद बेटों की लाशें आती हैं। छत्तीसगढ़ में नक्सली अपने इलाकों में चौड़ी सडक़ें बनने से बौखलाए हुए हैं। कुछ समय पहले नक्सली प्रभाव वाले 44 जिलों में 5,412 किलोमीटर सडक़ निर्माण परियोजना को मंजूरी दी गई है। इसे रोकना भी उनका एक मकसद है। उन्हें पता है कि सडक़ बनने से सुरक्षा बलों की आवाजाही आसान होगी। इससे नागरिक सुविधाएं आम लोगों तक पहुंचने लगेंगी तो वे नक्सल प्रभाव से बाहर निकल जाएंगे। लेकिन जनता भी यह नहीं समझ पा रही कि सडक़ें उनके फायदे के लिए हैं। लोगों को लगता है कि सरकार सीआरपीएफ जवानों को सुगमता से पहुंचाने और चुनावी दौरे आसान बनाने के लिए सडक़ें बनवा रही है।

अनेक विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि नक्सली हमले में राज्य पुलिस का एक भी जवान क्यों नहीं मारा गया? रिपोर्ट है कि माओवादियों के खिलाफ सीआरपीएफ ऑपरेशनों से स्थानीय पुलिस प्राय: बच निकलती है। पुलिस पर नक्सली मुखबिरी का भी आरोप लगता है। इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए? साफ है कि राज्य सरकार के इरादे साफ नहीं हैं। इस हमले से मात्र एक हफ्ता पहले 16 अप्रैल को कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ की बीजेपी सरकार पर लगे एक गंभीर आरोप को दोहराया। छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस नेता भूपेश बघेल ने 2013 की घटना याद दिलाई, जब एक नक्सल हमले में सिर्फ कांग्रेसी नेताओं को निशाना बनाया गया था। उसमें कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल, तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, पूर्व विपक्षी नेता महेंद्र कर्मा समेत 31 लोग मारे गए थे। कांग्रेस नेता जीराम वेली के उस काफिले पर बस्तर में 25 मई, 2013 को नक्सलियों ने घात लगाकर हमला किया था। कांग्रेस ने ‘पुलिस और नक्सल नेक्सस’ का आरोप दोहराते हुए सीबीआई जांच की मांग की है। पार्टी का कहना है कि बीजेपी ने राजनीतिक इस्तेमाल के लिए करोड़ों रुपये नक्सलियों को दिए हैं। इस आरोप को बीजेपी खारिज कर चुकी है, मगर जनता एक सिरे से खारिज नहीं कर सकती क्योंकि उस हमले में सिर्फ कांग्रेसी मारे गए थे। अगर बीजेपी वास्तव में नक्सलवाद से लडऩे को लेकर गंभीर है तो उसे इसकी जांच करानी चाहिए और इसका सच उजागर करना चाहिए।

फूट डालने की नीति

नक्सलियों से निपटने के लिए लोगों को सरकारी हमलावर बनाकर लाइसेंसी हिंसा के लिए तैयार करने वाला सलवा जुडूम अभियान भी छत्तीसगढ़ सरकार का एक अजेंडा था। अगर सुप्रीम कोर्ट ने उस पर फटकार के साथ रोक नहीं लगाई होती तो वह भी विकास योजना के साथ फल-फूल रहा होता। उसके जरिए जो नक्सली नहीं थे, उन्हें पैसे और हथियार देकर ‘सरकारी नक्सली’ बनाया गया। एक परिवार में अगर सरकारी और गैर-सरकारी दोनों नक्सली हों तो ‘फूट डालो राज करो’ वाली ब्रिटिश टाइप नीति चलती रहती। नक्सलियों का विरोध इससे भी है। बहरहाल राजनाथ सिंह ने रणनीति में संशोधन की जो संभावना जताई है, उसका खुलासा संभवत: 8 मई को होगा। उस दिन इस समस्या पर विचार करने के लिए नक्सल प्रभावित 10 राज्यों के सीएम की बैठक बुलाई गई है। देखना यह है कि उस बैठक में वास्तव में आम सहमति से कोई कारगर रणनीति सामने आती है या वह मीटिंग भी रस्म-अदायगी ही साबित होती है।

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to top