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Published on Dec 11, 16 |     Story by |     Total Views : 305 views

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नोटबंदी पर एतिहासिक फैसला मोदी सरकार का वार काला धन जार जार

demonetization9/11 विश्व इतिहास में दो घटनाओं के लिए हमेशा याद किया जाएगा। पहली घटना अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप का राष्ट्रपति बनना और दूसरी घटना भारत में नोटबंदी। ट्रंप का प्रभाव अमेरिका या विश्व पर तो बाद में पड़ेगा लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पांच सौ और हजार रुपए के नोट बंदी का असर तत्काल पडऩा शुरू हो गया है। सरकार ने यह कदम आतंकवाद, भ्रष्टाचार और कालेधन पर अंकुश लगाने के लिए किया है। क्योंकि भारत में भ्रष्टाचार के कारण कालाधन इतना जमा हो गया है जिससे आतंकी, नक्सली और अन्य देश विरोधी गतिविधियां चल रही हैं। सरकार के इस निर्णय से भले ही प्रथम दृष्टया जनता को आर्थिक इमरजेंसी के हालात का सामना करना पड़ रहा है लेकिन सरकार का दावा है कि यह कालाधन और आतंक के अंतरंग रिश्तों पर वार है। सरकार के इस कदम से देश में अक्टूबर में जो 17,50,000 करोड़ के नोट प्रचलन में थे, जिसका 84 फीसदी या 14,50,000 करोड़ रुपया 500 और 1000 के नोटों के रूप में था, वे अब बेकार हो गए हैं। एक अनुमान के अनुसार इन नोटों में से कालेधन के रूप में जो भी रकम छुपाकर रखी गई थी उसमें से 4-5 हजार करोड़ रुपए की पुरानी करेंसी सरकार को मिल जाएंगे। यानी सरकार ने जो दांव खेला है वह कई मायनों में कारगर सिद्ध होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 और 1000 रुपये के नोटों का चलन बंद करने की अचानक घोषणा कर कालाधन, भ्रष्टाचार, आतंकवाद और जाली नोट पर नकेल कसने का जबर्दस्त मास्टर स्ट्रोक लगाया है। मंगलवार को राष्ट्र को संबोधित करते हुए उन्होंने 500 और 100 रुपये के नोट रखने वालों को 50 दिन की मोहलत दी है। कालेधन और भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए इसे मोदी सरकार का अब तक का सबसे बड़ा आर्थिक सुधार माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री का पद संभालने के ढाई साल बाद पहली बार टेलीविजन पर राष्ट्र के नाम संबोधन में मोदी ने कहा कि जल्द ही 500 और 2000 रुपये के नए नोट जारी किए जाएंगे। बैंक और डाकघर के खाताधारक 10 नवंबर से 30 दिसंबर तक अपने खातों में पुराने नोट बिना किसी सीमा तक जमा करा सकते हैं। उन्होंने कहा कि 2000 और 500 रुपये के नए नोटों का स्वरूप भी बिल्कुल बदला होगा। ये नोट बैंकों में पहुंच चुके हैं और संभवत: 10 नवंबर से चलन में आ जाएंगे।
मोदी ने कहा, ‘अतीत के अनुभवों के आधार पर भारतीय रिजर्व बैंक बड़े नोटों का चलन सीमित रखने का प्रावधान करेगा। अफरातफ री न मचे, इसलिए 9 नवंबर को बैंक और एटीएम बंद रहेंगे। भीड़ के दबाव से बचने के लिए कुछ जगहों पर 10 नवंबर को भी एटीएम काम नहीं करेंगे। चेक, डिमांड ड्राफ्ट, डेबिट या क्रेडिट कार्ड और इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर के जरिये लेनदेन की कोई सीमा नहीं रहेगी। शुरुआती कुछ दिनों तक एटीएम से प्रतिदिन निकासी की सीमा 2000 रुपये रखी गई है जिसे बाद में बढ़ाकर 4,000 रुपये कर दिया जाएगा। बाजार में नए नोटों की सप्लाई को ध्यान में रखते हुए प्रतिदिन बैंकों से निकासी सीमा 10,000 रुपये और प्रति सप्ताह 20,000 रुपये तय की गई है। बाद में यह सीमा बढ़ा दी जाएगी।’

सारी दुनिया में एक नया ट्रेंड दिख रहा है. हर जगह वैसे लोग जो हाशिए पर हैं, गरीब हैं. जो दिल्ली-मुंबई, न्यूयॅार्क जैसी जगहों पर नहीं रहते वो खुद को पीड़ित महसूस कर रहे हैं. ब्रिटेन का यूरोपियन यूनियन से अलग होने के लिए वोट करना यानी ब्रेग्जिट की घटना इसका एक मजबूत उदाहरण है. लंदन कभी भी यूरोप से खुद को अलग नहीं करना चाहता था. लेकिन दूर-दराज के लोग ऐसा चाह रहे थे. जिसका नतीजा ब्रेग्जिट रहा.

सरकार ने फैसला किया है कि 24 नवंबर तक पहचान पत्र (मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड, पैन आदि) दिखाकर बैंक काउंटरों तथा चुनिंदा डाकघरों पर प्रतिदिन 500 रुपये और 1000 रुपये के नोट 4000 रुपये की सीमा तक बदले जा सकते हैं। बैंकों के अतिरिक्त काउंटर खोले जाएंगे और अतिरिक्त घंटों तक काम किया जाएगा। 25 नवंबर से यह सीमा बढ़ा दी जाएगी। जो लोग किसी कारणवश 30 दिसंबर 2016 तक भी 500 और 1000 के नोट जमा नहीं करा पाते हैं, उनके लिए आरबीआई ने 31 मार्च 2017 तक की तारीख तय की है और इसके लिए उन्हें घोषणापत्र के साथ ये नोट जमा करने की सुविधा रहेगी।
अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल बाजार में 1000 के नोट वाले 6.7 अरब रुपये हैं जबकि 500 के नोट वाले 16.5 अरब रुपये। पीएम मोदी ने स्वीकार किया कि इस महत्वपूर्ण फैसले से लोगों को थोड़ी असुविधा जरूर होगी लेकिन भ्रष्टाचार मिटाने के लिए उन्हें कुछ दिनों तक यह सहन करना होगा। उन्होंने राजनीतिक दलों, सभी सरकारों, सामाजिक संगठनों और मीडिया से कालेधन के खिलाफ इस युद्ध में पूरे उत्साह से साथ देने और इसे सफल बनाने की अपील की। पीएम ने लोगों को भरोसा दिलाते हुए कहा, आपका पैसा आप ही का रहेगा। आपका कुछ नहीं खोएगा। सरकार आपको इस बात का भरोसा दिलाती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार शाम को कालाधन और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए 500 और 1000 रुपये के नोट को बंद करने का ऐलान किया. मोदी जी के इस फैसले की तुलना किसी ने सर्जिकल स्ट्राइक से की तो किसी ने पोखरण विस्फोट से भी कर दी.
इस फैसले से मुख्य रुप से जो बातें निकल कर आई हैं वो ये हैं- मोदी जी की नजर आने वाले चुनावों पर है. आतंकवाद और नकली नोटों के रिश्ते पर हमला. ब्लैक मनी को खत्म करना उनके एजेंडे में है. और सबसे बड़ी बात- सरकारी खजाने में खूब सारा पैसा कैसे लाया जा सके.
सारी दुनिया में एक नया ट्रेंड दिख रहा है. हर जगह वैसे लोग जो हाशिए पर हैं, गरीब हैं. जो दिल्ली-मुंबई, न्यूयॅार्क जैसी जगहों पर नहीं रहते वो खुद को पीड़ित महसूस कर रहे हैं. ब्रिटेन का यूरोपियन यूनियन से अलग होने के लिए वोट करना यानी ब्रेग्जिट की घटना इसका एक मजबूत उदाहरण है. लंदन कभी भी यूरोप से खुद को अलग नहीं करना चाहता था. लेकिन दूर-दराज के लोग ऐसा चाह रहे थे. जिसका नतीजा ब्रेग्जिट रहा.
इस नए ट्रेंड और पॉलिटीकल मूड को मोदी जी ने बखूबी भांप लिया है. उन्हें यह पता है कि किस तरह के फैसलों से आम आदमी खुश हो जाएगा. इसके लिए दिल्ली-मुंबई थोड़ा नाराज भी हो जाए तो चलेगा.
फैसले की टाइमिंग भी उन्होंने बिल्कुल सटीक चुनी. उन्होंने यह कदम ऐसे वक्त में उठाया जब उत्तर प्रदेश और पंजाब में चुनाव होने वाले हैं. वैसे तो चारों तरफ यूपी चुनाव की चर्चा जोरों पर है. लेकिन मोदी जी ने पंजाब को नजरअंदाज नहीं किया है क्योंकि पंजाब ऐसा राज्य है जहां ड्रग और तस्करी का धंधा चरम पर है. ट्रांसपोर्ट समेत ऐसे कई धंधे हैं जिनमें काला धन लगा हुआ है. गौर करने वाली बात ये है कि पंजाब पाकिस्तान से लगा राज्य है. आने वाले चुनाव में सभी पार्टियां मुश्किल में फंसेगी क्योंकि ‘राजनीतिक खेल’ के लिए उनके पास पैसे नहीं होंगे. इस बात से सभी वाकिफ हैं कि आतंकवाद का पूरा कारोबार काले धन से ही संचालित होता है. जाली नोटों का इससे तगड़ा कनेक्शन है और इसकी तादाद बढ़ी है. पीएम मोदी जी ने काले-धन पर किए गए हमले को राष्ट्रवाद का जामा पहना दिया है. बीजेपी चुनाव जीतने के लिए जिन मुद्दों को उछाल रही है उसमें काला धन और राष्ट्रवाद का ये मिक्स नया जोश भर देगा.
1000-500 के नोट बंद करने के मोदी जी के इस फैसले से कुछ दिनों तक रोजमर्रा के कारोबार में दिक्कतें आ सकती हैं. लेकिन यह बात तो तय है कि इस फैसले से बहुत बड़े पैमाने पर कालाधन रखने वाले नेताओं, अफसरों और व्यापारियों को बहुत बुरे दिन देखने पड़ेंगे. हो सकता है कि मोदी जी के कुछ कोर वोटर्स इस फैसले से खफा हो जाएं. उनकी मुसीबतों के अनेकों किस्से आने वाले दिनों में सामने आएंगे. लेकिन सरकार के पास इंतजाम है कि इस कमी को भरने के साथ-साथ बीजेपी की कोर बेस कैसे बढ़ाई जाए. ब्लैक मनी का मुद्दा उनको अपील करेगा जिसको मोदी अपने साथ जोडऩा चाहते हैं.
मौजूदा समय में 14 लाख करोड़ के बड़े नोट चलन में हैं. उनमें से एक बहुत बड़ा हिस्सा काला धन का हो सकता है. जब यह काला धन घोषित होगा तो उसपर सरकार को लगभग दो से ढाई लाख करोड़ तक की छप्परफाड़ टैक्स की कमाई हो सकती है. वैसे एक बात काबिल-ए-गौर है वोट हो या नोट, मोदी जी को जो भी मिलता है छप्पर फाड़ कर ही मिलता है.
एक ऐसे समय में जब प्राइवेट सेक्टर में निवेश न के बराबर हो रहा है, आने वाले दिनों में सरकार के पास विकास पर खर्च करने के लिए बहुत सारा पैसा होगा. मोदी जी दुनिया से कह सकेंगे कि इंडियन इकोनॉमी की अच्छी-खासी सफाई हो चुकी है और विदेशी इन्वेस्टर आराम से अब अपना पैसा यहां लगा सकते हैं.
कुछ देर के लिए मोदी जी का यह कदम जोखिम भरा लग सकता है लेकिन लॉन्ग टर्म में उनको फायदे की उम्मीद ज्यादा दिख रही है जैसे आने वाले महीनों में ब्याज दर कम रहे, महंगाई की रफ्तार थमे, करेंसी मजबूत बनी रहे.
हालांकि दूसरी तरफ रियल एस्टेट और कॅमोडिटी कारोबार को इस कदम से नुकसान हो सकता है लेकिन इस पूरे शिगूफा का नेट रिजल्ट पॉजिटिव ही होगा. कम से कम मोदी जी के फैसले के पीछे उनका यही आकलन नजर आ रहा है.

 

क्या कहते हैं आंकड़े
एक आंकड़े के अनुसार इस कदम से सरकार के खाते में जितने रुपए आएंगे उससे कहीं अधिक की हानि अर्थव्यवस्था को दो दिन में हो चुकी है। दूसरी बात, काला धन उतना ज्यादा नुकसानदेह नहीं है जितना माना जाता है। इसके उलट काले धन से अर्थव्यवस्था को उड़ान मिलती है। शहरों में जो मॉल, बिल्डिंग प्रोजेक्ट, होटल्स, थिएटर, बड़े-बड़े प्रोजेक्ट देखते हैं, वो कालेधन की ही देन हैं, जिनके निर्माण से श्रमिकों को सालों-साल रोजगार मिलता है और बनने के बाद पढ़ी लिखी आबादी को। जबकि दूसरी ओर मध्यम या उच्च वर्ग को अपने किये भुगतान के बदले सहूलियतें मिलती हैं। यानि पैसा गोल गोल समाज में घूमता है। खैर सरकार ने जो कदम उठाया है वह सार्थक होगा कि नहीं उस पर भी सवाल उठ रहे हैं। फिलहाल भारत किसी वित्तीय आपदा या बैंकों की तबाही से प्रभावित देश (हाल में ग्रीस) की तरह नजर आने लगा है, जहां बैंक व एटीएम बंद हैं, लंबी कतारे हैं और लोग सीमित मात्रा में नकद लेने और खर्च करने को मजबूर हैं। ऐसे मुल्क में जहां बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था नकदी पर चलती हो, 50 फीसदी वयस्क लोगों का बैंकों से कोई लेना-देना न हो और बड़े नोट नकद विनिमय में 80 फीसदी का हिस्सा रखते हों वहां सबसे ज्यादा इस्तेमाल वाले नोटों को कुछ समय के लिए अचानक बंद करना विध्वंस ही होगा न! खास तौर पर तब जबकि रिजर्व बैंक की नोट मुद्रण क्षमताएं सीमित और आयातित साधनों पर निर्भर हैं।
वैसे इस अफरा-तफरी का कुल किस्सा यह है कि सरकार को नए डिजाइन के नोट जारी करने थे। नकली नोट रोकने की कोशिशों पर अंतरराष्ट्रीय सहमतियों के तहत रिजर्व बैंक ने सुरक्षित डिजाइन (ब्लीड लाइंस, नंबर छापने का नया तरीका) की मंजूरी लेकर तकनीक जुटाने का काम पिछले साल के अंत तक पूरा कर लिया था। नए नोटों को रिजर्व बैंक के नए गवर्नर (राजन के बाद) के हस्ताक्षर के साथ नवंबर 2016 में जारी किया जाना था। इसमें 2,000 रु. का नया नोट भी था। इसी क्रम में नकली नोटों में पाकिस्तानी हाथ होने की पुष्टि के बाद सरकार ने करेंसी को सुरक्षित बनाने की तकनीक व साजो-सामान को लेकर आयात पर निर्भरता तीन साल में 50 फीसदी घटाने का निर्णय भी किया था। नए डिजाइन के नोट जारी करने के लिए पुरानी करेंसी को बंद (डिमॉनेटाइज) नहीं किया जाता, बस नए नोट क्रमश: सिस्टम में उतार दिए जाते हैं।

बदलेगी तस्वीर
जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश को नए ढांचे में ढालने की कोशिश में लगे हैं उससे यह भी लग रहा है कि देश में इमरजेंसी लग सकती है। साथ ही पाकिस्तान की भारत विरोधी गतिविधियों को देखते हुए संभावना जताई जा रही है कि आने वाले ढाई सालों में भारत कभी भी पाकिस्तान पर हमला कर सकता है। इसलिए जनता को अभी से ऐसी परिस्थितियों के तैयार रहने की जरूरत है। उधर सरकार को देश में कालाबाजारी और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए बैंकिंग व्यवस्था सुदृढ़ करनी पड़ेगी साथ ही कैशलेश सोसायटी का निर्माण करना पड़ेगा। केंद्र सरकार को उम्मीद है कि नोटबंदी के फैसले से ऐसा माहौल बनेगा कि लोग नकदी का प्रयोग कम कर देंगे। अच्छा होता कि इसके लिए पहले ही कुछ जरूरी कदम उठा लिए जाते। एक कदम तो बैंकिंग सेवाओं को सुदढ़ करने का होना चाहिए था, क्योंकि देश का एक बड़ा इलाका बैंकिंग सेवाओं के मामले में पिछड़ा हुआ है। इसका प्रमाण नोटबंदी के फैसले के बाद मची अफरा-तफरी से भी मिलता है।

 

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