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Published on Oct 21, 16 |     Story by |     Total Views : 264 views

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तीन तलाक- कैसे बनेगी बात?

मुसलमान पुरुष तीन बार तलाक शब्द का उच्चारण करके अपनी शादी समाप्त कर सकते हैं. लेकिन कई मुस्लिम देशों में ये उच्चारण एक ही बार में ना कर के तीन महीने की अवधि में करने का नियम है, ताकि पति को तीसरे और अंतिम बार तलाक के उच्चारण से पहले अपने फैसले पर ठीक से विचार करने का पर्याप्त मौका मिल सके.


page1एक बार में तीन बार तलाक कह दिया और टूट गया रिश्ता? शादी के जिस संबंध को तमाम कसमों और गवाहों के सामने जोड़ा जाता है, उसे तोडऩे के इतने आसान नियम क्या स्वीकार्य होने चाहिए. भारत में फेसबुक और ट्विटर जैसे अन्य सोशल मीडिया वेबसाइटों, स्काइप और मोबाइल फोन के जरिए बढ़ते हुए तलाक के मामलों के मद्देनजर कुछ मुस्लिम महिला संगठनों समेत कई महिला अधिकार संगठन ट्रिपल तलाक यानी एक ही बैठक में होने वाले तलाक को गैरकानूनी घोषित किए जाने की मांग कर रहे हैं.
मुसलमान पुरुष तीन बार तलाक शब्द का उच्चारण करके अपनी शादी समाप्त कर सकते हैं. लेकिन कई मुस्लिम देशों में ये उच्चारण एक ही बार में ना कर के तीन महीने की अवधि में करने का नियम है, ताकि पति को तीसरे और अंतिम बार तलाक के उच्चारण से पहले अपने फैसले पर ठीक से विचार करने का पर्याप्त मौका मिल सके. पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित कई इस्लामी देशों में ट्रिपल तलाक प्रतिबंधित है. पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित कई इस्लामी देशों में ट्रिपल तलाक प्रतिबंधित है. कई देशों में तो पति-पत्नी के बीच सुलह करवाने के लिए मध्यस्थता परिषदों और न्यायिक हस्तक्षेपों का भी प्रावधान है. लेकिन भारत में स्थिति इससे अलग है. मुस्लिम पर्सनल लॉ अभी भी इस तरह के ट्रिपल तलाक की अनुमति देता है.
भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े कोई संहिताबद्ध कानून नहीं हैं. ये मुख्य रूप से अंग्रेजों के समय के दो कानूनों द्वारा नियंत्रित होते हैं. पहले 1937 एक्ट में कहा गया है कि भारत के मुसलमान शरिया से संचालित होंगे. लेकिन उसमें यह उल्लेख नहीं है कि शरिया में क्या शामिल है और क्या नहीं और शरिया के विभिन्न पहलू क्या हैं. दूसरा है 1939 एक्ट, जिसमें ऐसे 9 कारणों का जिक्र है जिनके आधार पर एक मुस्लिम महिला तलाक के लिए अदालत जा सकती है. इनके अलावा 1986 का रखरखाव अधिनियम भी है जिसके अनुसार तलाक के बाद मुस्लिम महिला एकमुश्त रखरखाव पाने की हकदार है. तीन तलाक के मुद्दे पर सुनवाई के दौरान पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने कहा है कि कोर्ट यह तय करेगा कि अदालत किस हद तक मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल दे सकती है और क्या उसके कुछ प्रावधानों से नागरिकों को संविधान द्वारा मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है.
बहरहाल, शाह बानो का मामला भारतीय इतिहास में एक नजीर बन चुका है. इंदौर की रहने वाली शाह बानो ने तलाक के बाद अपने शौहर से गुजारे-भत्ते की मांग की थी. भारत की सुप्रीम कोर्ट ने 1985 में 62 वर्षीय शाह बानो के हक में फैसला दिया था. उस समय आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसका विरोध किया था. बाद में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने संसद में कानून को बदल कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था. इस मुद्दे को विवाद के बजाय गंभीरता से हल करने के जरूरत है.

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