All Rights

Published on Feb 7, 16 |     Story by |     Total Views : 2,337 views

Pin It

Home » Editorial » कहां जा रही है शिक्षा

कहां जा रही है शिक्षा

अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसे लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं होती? अनुभवहीन शिक्षक पढ़ा रहे है. मान्यता लेने के बाद ऐसे शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालयों को शिक्षा की कोई परवाह नहीं है. उन्हें तो अपने मुनाफे से मतलब है. सवाल है कि ऐसे में स्कूलों में किस तरह का शिक्षण कार्य हो रहा होगा. देश की संघीय ढांचे में हालांकि शिक्षक शिक्षा पर विस्तृत नीतिगत और विधिक ढांचा केन्द्र सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है, फिर भी विभिन्ने कार्यक्रमों और स्कीमों का कार्यान्वयन प्रमुखत: राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है. स्कूली बच्चों की शिक्षा उपलब्धियों के सुधार के विस्तृत उद्देश्य की दोहरी कार्यनीति है.


रष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (एन सी टी ई), जो केन्द्र सरकार का सांविधिक निकाय है, देश में शिक्षा के नियोजित और समन्वित विकास का जिम्मेदार है. एन सी टी ई विभिन्न शिक्षा पाठ्यक्रमों के मानक एवं मानदंड, शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यताएं, विभिन्न पाठ्यक्रमों के लिए छात्र-अध्यापकों के प्रवेश के लिए पाठ्यक्रम एवं घटक तथा अवधि एवं न्यू्नतम योग्यता निर्धारित करती है. यह ऐसे पाठ्यक्रम शुरू करने की इच्छुक संस्थाओं को मान्यता भी प्रदान करता है और उनके मानदंड और गुणवत्ता नियमित करने और उन पर निगरानी के निमित्ता व्यवस्था है.  लेकिन सवाल है किया ये संस्था यह सब काम ईमानदारी से कर रहे है. क्या इसके अधिकारी ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभा रहे है? अगर हम देश में शिक्षा की बात करें तो सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान चलाकर पानी की तरह पैसा बहाया है. सरकार अभिभावकों को लिए स्कूल चलो रैली के माध्यम से जागरूक करने में लगी है। लेकिन फिर भी अभिभावकों का सरकारी स्कूलों में होने वाली पढ़ाई से भरोसा क्यों उठ गया है? क्यों वे अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में ही पढ़ाना पसंद करते हैं। चाहे वह स्कूल भैसों का तबेला ही क्यों न हो। ऐसे ही ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक विद्यालय संचालित है। कई ऐसे स्कूल है जहां बच्चों को बैठने के लिए पर्याप्त जगह तक नहीं है। स्कूल में बच्चे अधिक होने के कारण स्कूल संचालक बच्चों को बाहर बिठाते है. लेकिन, ये स्तो स्कूल की हालत है. अगर बात शिक्षकों और शिक्षकों की गुणवत्ता की करें तो मामला और भी उलझा नजर आता है. कई ऐसे सरकारी शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय ऐसे है जिनके पास कोई इंफ्रास्ट्रक्चर तक नहीं है लेकिन इन्हें मान्यता तक दे दी गई है. मान्यता मिलने के बाद ऐसे कॉलेज अपनी मनमानी करते है. शिक्षा के ठेकेदारों ने शिक्षा को व्यापार बना रखा है।

अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसे लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं होती? अनुभवहीन शिक्षक पढ़ा रहे है. मान्यता लेने के बाद ऐसे शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालयों को शिक्षा की कोई परवाह नहीं है. उन्हें तो अपने मुनाफे से मतलब है. सवाल है कि ऐसे में स्कूलों में किस तरह का शिक्षण कार्य हो रहा होगा. देश की संघीय ढांचे में हालांकि शिक्षक शिक्षा पर विस्तृत नीतिगत और विधिक ढांचा केन्द्र सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है, फिर भी विभिन्ने कार्यक्रमों और स्कीमों का कार्यान्वयन प्रमुखत: राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है. स्कूली बच्चों की शिक्षा उपलब्धियों के सुधार के विस्तृत उद्देश्य की दोहरी कार्यनीति है. इसमें स्कूल प्रणाली के लिए अध्यापकों को तैयार करना (सेवा पूर्व प्रशिक्षण) और (ख) मौजूदा स्कूल अध्यापकों की क्षमता में सुधार करना (सेवाकालीन प्रशिक्षण). ये काम एनसीटीई का है. लेकिन क्या ऐसा हो पा रहा है?

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to top