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Published on Dec 9, 16 |     Story by |     Total Views : 386 views

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अहिंसात्मक लोकशक्ति का नमूना कटरांव

ahinsathmak--lokshaktiगाँधी के स्वराज अर्थ केवल राजनीतिक स्तर पर विदेशी शासन से स्वाधीनता प्राप्त करना नहीं है, बल्कि इसमें सांस्कृतिक व नैतिक स्वाधीनता का विचार भी निहित है। गाँधी का स्वराज ‘निर्धन का स्वराज’ है, जो दीन-दुखियों के उद्धार के लिए प्रेरित करता है। अहिसांत्मक समाज गाँधी की दृष्टि में आदर्श समाज-व्यवस्था वही हो सकती है, जो पूर्णत: अहिंसात्मक हो। जहाँ हिंसा का विचार ही लुप्त हो जाएगा, वहाँ ‘दण्ड’ या ‘बल-प्रयोग’ की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी अर्थात् आदर्श समाज में राजनीतिक शक्ति या राज्य की कोई आवश्यकता नहीं होगी। गाँधी हिंसा तथा शोषण पर आधारित वर्तमान राजनीतिक ढाँचे को समाप्त करके, उसके स्थान पर एक ऐसी व्यवस्था स्थापित करना चाहते थे, जो व्यक्ति की सहमति पर आधारित हो तथा जिसका उद्देश्य अहिंसात्मक तरीकों से जन-कल्याण में योगदान देना हो।
उनके इस मूल-मंत्र को उनकी कर्मभूमि चंपारण के ही एक छोटे से गांव ने इसे बखूबी अपनाया है। बिहार में चंपारण के गौनाहा प्रखंड क्षेत्र में एक छोटा गांव कटरांव है। यह जमुनिया पंचायत के अंतर्गत आता है। 2000 की आबादी वाला यह गांव आज देश के 125 करोड़ लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन गया है। अहिंसात्मक लोकशकित का नमूना पेश कर रहा हे यह गांव।आजादी के बाद से इस गांव में अबतक एक भी मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है। यहां के लोग ना तो थाने गए हैं और ना ही कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाया है।
इस गांव में अब तक कोई अपराध नहीं हुआ है जिसे लेकर थाने में प्राथमिकी उर्ज की गई हो। अगर हल्का विवाद भी हुआ तो उसका निपटारा गांव स्तर पर ही लोगों ने कर लिया है।
गांव के मुखिया सुनील कुमार गढ़वाल ने बताया कि इस गांव के लोग समझदार हैं और जब कभी भी विवाद होता है तो आपस में बैठकर सुलह कर लेते हैं। इस गांव में कभी पुलिस नहीं आती है। आजतक लोग कोर्ट-कचहरी नहीं गए हैंं।
गांव की महिला सेम्पू देवी का कहना है कि गांव में झगड़ा-झंझट नहीं होता है। अगर होता भी है तो गांव के लोग आपस में निपटा लेते हैं। बच्चों को उनके मां-पिता खुद शौक से पढ़ाते हैं।
ग्रेजों की गुलामी देख चुके गांव के बुजुर्ग की माने तो आजतक इस गांव में पुलिस की जरूरत ही महसूस नहीं हुई। जयनारायण महतो का कहना है कि जब देश आजाद हुआ तब से लेकर आज तक गांव में कभी कोई बड़ा झगड़ा-झंझट नहीं हुआ और अगर छोटा-मोटा मामला हुआ भी तो उसे आपस में बैठकर सुलझा लिया जाता है।
आदिवासी बहुल यह गांव काफी पिछड़ा हुआ माना जाता है, लेकिन इस गांव के लोगों की सोच और जज्बा उन तमाम आधुनिक और शिक्षित कहे जाने वाले समाज से कहीं आगे है।
नरकटियागंज के अनुमंडल आरक्षी पदाधिकारी अमन कुमार ने बताया कि कटरांव गांव में अभी तक कोई केस दर्ज नहीं हुआ है। यह एक अच्छी बात है कि गांव में इस तरह का विवाद नहीं होता है कि मुकदमा दर्ज हो। लोग अपने स्तर पर मामले को सुलझा लेते हैं। हम लोग चाहेंगे कि ऐसे गांवों की संख्या और बढ़े।
यहां थारू लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है।उन लोगों के बीच जो भी थोड़ा बहुत मामला होता है तो आपस में गुमस्ता स्तर पर बैठकर मामले को सुलझा लिया जाता है। दरअसल, थारू समाज के हर गांव में एक गुमस्ता होता है जिसमें गांव के सभी मामले का निपटारा होता हैं।इस गांव में भी गुमस्ता स्तर पर ही स्थानीय विवाद को सुलझा लिया जाता है।अभी तक कोई ऐसा मामला नहीं हुआ जो थाना या कोर्ट कचहरी तक पहुंचे।थारूओं में यह गांव एक मिसाल है क्योंकि यह बापू की धरती है।गांधी के भितिहरवा आश्रम के बगल में यह गांव है।
के भितिहरवा से महात्मा गांधी ने ब्रिटिश राज को चुनौती दी। 1917 का वह साल जब देश के आजादी के आंदोलन के इतिहास के केंद्र में महात्मा गांधी आ जाते हैं। देश में बापू के दो प्रमुख आश्रम हैं अहमदाबाद में साबरमती और महाराष्ट्र में वर्धा। पर भितिहरवा आश्रम का गौरव इन सबसे कई मामलों में ज्यादा है।
7 अप्रैल 1917 का दिन था जब बापू राजकुमार शुक्ल के आग्रह पर पश्चिम चंपारण के भितिहरवा गांव में पहुंचे। भितिहरवा की दूरी नरकटियागंज से 16 किलोमीटर है। बेतिया से 54 किलोमीटर है। बापू यहां देवनंद सिंह, बीरबली जी के साथ पहुंचे। बताया जाता है कि बापू सबसे पहले पटना पहुंचे थे जहां वे डाक्टर राजेंद्र प्रसाद के बंग्ले में रुके थे। वहां से आकर मोतिहारी में रुके।मोतिहारी से बेतिया आए।बेतिया के बाद उनका अगला प्रवास कुमार बाग में हुआ। कुमार बाग से हाथी पर बैठकर बापू श्रीरामपुर भितिहरवा पहुंचे थे। गांव के मठ के बाबा रामनारायण दास द्वारा बापू को आश्रम के लिए जमीन उपलब्ध कराई गई। 16 नवंबर 1917 को बापू ने यहां एक पाठशाला और एक कुटिया बनाई।1917 का खुदा वह कुआं जिससे बा और बापू पानी निकालते थे।
20 नवंबर 1917 को भितिहरवा में कस्तूरबा गांधी,गोरख बाबू, जनकधारी प्रसाद, महादेव बाबू, हरिशंकर सहाय, सोमन जी, बालकृष्णजी और डा.देव का भितिहरवा आगमन हुआ। बापू का यहां रहना ब्रिटिश अधिकारियों को बिल्कुल गवारा नहीं था। एक दिन बेलवा कोठी के एसी एमन साहब ने कोठी में आग लगवा दी। उनकी साजिश बापू की सोते हुए हत्या करवा देने की थी। पर संयोग था बापू उस दिन पास के गांव में थे। इसलिए बच गए। बाद में सब लोगों ने मिलकर दुबारा पक्का कमरा बनाया। जिसकी छत खपरैल है। इस कमरे के निर्माण में बापू ने अपने हाथों से श्रमदान किया। कहते हैं कि बापू के प्रयोग का असर इस गांव पर है।
गांव के बुजुर्ग विष्णु महतो की माने तो गुमस्ता के साथ गांव के लोग बैठकर विवाद को सुलझाने का प्रयास करते हैं।साथ ही उस समय दोषी व्यक्ति को गुमस्ता और गांव वालों की सहमति से दंड भी दिया जाता हैं।यदि कोई व्यक्ति गुमस्ता का फैसला नहीं मानता था तो उसकी पिटाई की जाती है।
अभी इस गांव के गुमस्ता शिवनारायण गौरो हैं। गांव के ही दीपनारायण महतो और गंगा महतो में भी 10-15 साल पहले जमीन को लेकर विवाद हुआ था, जिसे गांव के लोगों ने बैठकर गुमस्ता स्तर पर सुलझा लिया गया था।
यह गांव वास्तव में देश व दुनिया को दे रहा विकास व भाईचारे का संदेश। शांति के साथ विकास की चाह की वजह से ही कटराव अन्य गांवों के लिए नजीर है।ग्रामीणों के भाईचारे की मिसाल इसी को लेकर दी जाती है कि गांव में पुलिस नहीं आई है। गांव में कोई विवाद नहीं होता है। हर विवाद गांव में ही निपटा लिया जाता है।

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