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Published on Jun 18, 17 |     Story by |     Total Views : 138 views

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कौन थे विनोद खन्ना : अभिनेता, सन्यासी और राजनेता ?

बॉलीवुड के सदाबहार ऐक्टरों में से एक विनोद खन्ना ने कई भूमिकाएं निभाईं जिसके कारण वह पिछले चार दशक से लोगों के दिलो-दिमाग पर छाये रहे हैं। उन्होंने धर्मेन्द्र के साथ मेरा गांव-मेरा देश, राजपूत और क्षत्रिय जैसी फिल्में की जिनकी कहानी बीते हुए ज़माने, गांव और डाकुओं के इर्द-गिर्द घूमती थी। बाद में उन्होंने अमिताभ बच्चन के साथ एक सुपरहिट जोड़ी बनाई जिसमें हेराफेरी, परवरिश, खून-पसीना और मुकद्दर का सिकंदर जैसी फिल्में शामिल रहीं।


vinod khannaजब भी विनोद खन्ना की चर्चा होती है तो सबसे पहले मेरे ध्यान मे आता है बॉलीवुड की फिल्म ‘बंटवारा’ जिसमें उन्होंने धर्मेन्द्र के साथ भूमिका निभाई थी। 1989 में रिलीज़ हुई इस फिल्म के आखिरी क्षण मुझे आज भी अच्छी तरीके से याद हैं। अमरीश पुरी ने इस फिल्म में खलनायक का रोल अदा किया था जिसमें वह एक भ्रष्ट पुलिस अफसर बने थे। फिल्म के आखिरी दृश्य में धर्मेन्द्र और विनोद खन्ना, अमरीश पुरी को रेत मे दौड़ा कर उनका खात्मा करते हैं जैसे जंगली सूअर का शिकार किया जा रहा हो। इस मौत के खेल में दोनों का अंत पुलिस की गोलियों की बौछार से होता है जो वहां पर मौजूद थी।

बॉलीवुड के सदाबहार ऐक्टरों में से एक विनोद खन्ना ने कई भूमिकाएं निभाईं जिसके कारण वह पिछले चार दशक से लोगों के दिलो-दिमाग पर छाये रहे हैं। उन्होंने धर्मेन्द्र के साथ मेरा गांव-मेरा देश, राजपूत और क्षत्रिय जैसी फिल्में की जिनकी कहानी बीते हुए ज़माने, गांव और डाकुओं के इर्द-गिर्द घूमती थी। बाद में उन्होंने अमिताभ बच्चन के साथ एक सुपरहिट जोड़ी बनाई जिसमें हेराफेरी, परवरिश, खून-पसीना और मुकद्दर का सिकंदर जैसी फिल्में शामिल रहीं। हाल ही में उन्होंने वॉन्टेड और दबंग जैसी फिल्मों में बॉलीवुड के बेताज बादशाह सलमान खान के पिता की भूमिका निभाई थी।

विनोद खन्ना काफी मिलनसार व्यक्ति थे और राजनीति में कदम रखने के बाद उनसे संसद में मिलने का मुझे सौभाग्य भी प्राप्त हुआ। वह पंजाब के गुरदासपुर से चार बाद सांसद रहे (1998, 1999, 2004, 2014) और केवल 2009 में उनको हार का सामना करना पड़ा। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में उन्हें विदेश, संस्कृत और पर्यटन विभाग का केंद्रीय मंत्री भी बनाया गया था। विनोद खन्ना उस पीढ़ी से नाता रखते थे जो राजनैतिक दबाव के बावजूद अपनी बात कहने मे संकोच नहीं करते थे। 2014 चुनाव अभियान में एक ओर उन्होंने नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ की तो, वहीं उन्होंने गिरिराज सिंह के आपत्तिजनक टिप्पणी पर सार्वजनिक तौर पर निंदा भी की। जीवन के अपने सफर में विनोद खन्ना ने कई रोल अदा किए। बॉलीवुड में खलनायक से आगे बढ़ते हुए वह अस्सी की दशक में बतौर नायक की भूमिक में सबके दिल की धडक़न बन गए थे। उसके बाद वह कुछ समय के लिए सन्यासी भी रहे और आखिर में उन्होंने राजनीति में अपना योगदान दिया। अपने एक पुराने साक्षातकार में उन्होने कहा था कि आखिरकार हर व्यक्ति को अपना रास्ता अकेले तय करना है जिससे उसको आत्मिक सुख मिले। विनोद खन्ना से मिल कर ऐसा लगता था कि वह उस पड़ाव पर काफी पहले ही पहुंच चुके थे।

दुनिया में कुछ शख्सियतें ऐसी होती हैं जिनके लार्जर देन लाइफ कैनवस के बावजूद उनके अंदर का आम आदमी उन्हें दुनिया से अलहदा करता है। विनोद खन्ना यूं तो किसी भी सुपरस्टार से कभी भी कम नहीं थे लेकिन उनके अंदर एक कपड़ा व्यापारी का बेटा भी था जो जन-जन से उनकी अंतरंगता बढ़ाता था। उनकी बातें सुनने, परखने और बतियाने में अपनापन दिखाता था। उनसे अपना अनुभव या इंटरैक्शन हमारे बचपन के उस दौर का है जो इतना प्रगाढ़ भी ना था जो बाद में स्मृति बनकर अंकित हो जाए।

चूंकि बचपन में घर विलेपार्ले (पूर्व) स्थित उसी मोहन स्टूडियोज के पड़ोस में था जो फिल्म कलाकारों की कर्मस्थली हुआ करती थी इसलिए विनोद खन्ना के व्यक्तित्व को बेहद करीब से परखने का अवसर मिला। हम वहां फैन नहीं थे बल्कि हमारी तो उस वक्त ये दलील हुआ करती थी कि वे अपना सेट हमारे खेल के मैदान की बाउंड्री तक क्यों लगाए हुए हैं? यह सब यादें बचपन का एक अदद हिस्सा हैं। सारे वॉचमैन ही तो हमेशा गेंद लौटाया करते थे इसलिए वहां आने-जाने पर कोई रोकटोक नहीं थी।

चार दशक पहले गुलजार द्वारा निर्देशित पहली फिल्म ‘मेरे अपने’ की पूरी की पूरी शूटिंग इसी स्टूडियो में हुई। विनोद खन्ना-शत्रुघ्न सिन्हा का वह दमदार गुंडे का रोल हमारे दोस्तों के झुंड में कई श्याम और छेनू पैदा कर चुका था। महीनों या यूं कहिए लगभग साल तक चली इस फिल्म की शूटिंग के दौरान वे हम दोस्तों के झुंड से इस कदर घुलमिल गए थे कि अक्सर कई दिन हुई पढ़ाई का हाल भी पूछ लेते। शत्रुघ्न सिन्हा यहां एक शॉट देने के बाद बगल में लगे ‘बॉंबे टू गोवा’ का भी एक शॉट दे आते और इस पर विनोद खन्ना का उन्हें उलझाकर रखने का दो दोस्तों का मजाक और चुहलपन आज भी जेहन पर तरोताजा है। ‘मेरे अपने’ जब रिलीज हुई तो लग रहा था मानों यादों का पिटारा खुल गया हो। हर फ्रेम शूटिंग की यादें समेटे हुए था।

32 साल तक विनोद खन्ना के तकनीकी ज्ञान को संवरण करने और उसे निरंतर बढ़ाने वाले नागपाढ़ा के शब्बीर खान उन्हें याद करते हुए भावुक हो जाते हैं। चार दशक से अधिक समय तक म्यूजिक सिस्टम, टेप-रिकॉर्डर, वीसीआर से लेकर ऑडियो-विडियो सिस्टम के बेताज बादशाह को विनोद खन्ना ने सालों की मेहनत के बाद खोज निकाला था और कभी अलग नहीं होने दिया। म्संगीत के घोर जानकार विनोद उनसे घंटों तक ऑडियो-विडियो की बारीकियों, गुणों और रिपेयरिंग को समझते-परखते रहते थे। ‘नाकामिची’ हो या ‘बोस’ हर नामी ब्रैंड के हर बेहतरीन आइटम को इक_ा कर वे संगीत का संपूर्ण आनंद लेते थे।

विनोद खन्ना में न तो स्टारों जैसे नाज-नखरे थे और न ही आम इंसान से मिलने में कोई हिचकिचाट या न ही कोई झिझक। स्पॉटबॉय हो या चाय पिलानेवाला, बात करते-करते उसे ताली देना या लेना या कंधे पर हाथ रख लेने भर से वे उसे बरबस ही अपना मुरीद बना लेते थे। वे बिरले इंसान थे जिनके सहज व्यवहार के सभी कायल थे। मामूली जूनियर आर्टिस्ट हों या धर्मेंद्र, अमिताभ और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे स्थापित कलाकार सभी के साथ एक जैसे पेश आना।

हम दोस्तों के समूह में एक विवेक परूलेकर (पप्या) था जो उनके अपनत्व और सरल व्यक्तित्व से इस कदर प्रभावित था कि मानों अपने जीवन में उन्हें पूरी तरह अंगीकार कर लिया हो। दशक पहले ही दुनिया छोडक़र जा चुके उस दोस्त की तरह देश में विनोद खन्ना के करोड़ों चहेते थे जो उनके मैनरिज्म और चाल-ढाल को अपना चुके थे। उन्हीं की तरह बालों की शैली, बात करने का अंदाज और ऐक्शन। विनोद हर फैंस को असहज से बिल्कुल सहज बना देते थे। अपने अंदर असाधारण व्यक्तित्व समेटे विनोद एक ऐसे नायक थे जिन्होंने आध्यात्म की खोज में अपना सबकुछ खो दिया। लेकिन जब अंतर्ज्ञान हुआ तो ‘शून्य’ से जीवन शुरू कर वे फिर से शीर्ष पर जा पहुंचे।

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