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Published on Apr 18, 16 |     Story by |     Total Views : 485 views

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मेक इन इंडिया में अपार संभावनाएं

भारत में अभी भी सालाना 2 करोड़ 20 लाख व्यावसायिक दक्ष लोगों की जरूरत होती है जबकि इसके विपरीत हमारी सालाना आपूर्ति मात्र 43 लाख है 20 प्रतिशत से भी कम. यानी भारत के बाजार में भी वर्तमान समय में अपार संभावनाएं हैं. पढ़े-लिखे हुनरमंद नौजवानों के लिए, यानी हमें अभी भी अपना फोकस भारतीय बाजारों पर करना होगा, जहां आज भी अपार संभावनाएं हैं.


april-2016प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा शुरू की गई योजना मेक इन इंडिया को लगातार सफलता के शिखर पर पहुंचते हुए देखा जा रहा है. इस योजना के तहत ही एक बड़ा कदम उठते देखा जा रहा है. रशियन हेलिकॉप्टर्स के द्वारा अपने प्रोडक्शन प्लांट के साथ ही लम्बी अवधि के लिए चैन स्थापित करने की तैयारी की जा रही है. एक चीनी मंत्री पहले ही सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि वो मेक इन इंडिया और मेक इन चाइना का विलय चाहते हैं. लेकिन भारत का शुरुआती उत्साह अब मंद पड़ता दिख रहा है. शायद उसे लग रहा है कि चीन के प्रस्ताव के पीछे कोई छिपा हुआ एजेंडा है?  चीन ने अपने जादू का पिटारा पहली बार कुछ साल पहले तब खोला जब चाइना डेवलपमेंट बैंक (सीडीबी) ने कऱीब 10 अरब डॉलर का लोन रिलायंस कम्यूनिकेशन को दिया. उसके बाद इस बैंक ने कई भारतीय कंपनियो को लोन दिया. बैंकर किसी देश की खूबी और खामी को बहुत बारीकी से समझते हैं. वो कारोबारी खाता-बही के अंदर भी झांक लेते हैं. उन्हें पता होता है कि किस राजनीतिक निर्णय का किसी कंपनी की सफलता या विफलता पर क्या असर होगा. सीडीबी चीन का सरकारी नियंत्रण वाला बैंक है. भारत के बारे में उसकी गहरी जानकारी का लाभ चीनी नीति निर्माताओं को सीधे मिला होगा. जब कोई चीनी मंत्री मेड इन इंडिया और मेड इन चाइना के विलय करने के बारे में बात करे तो इसका मतलब है कि उन्होंने सभी संभावनाओं को खंगाल लिया है और निवेश की योजना भी बना ली है.

हाल ही मे प्रधानमंत्री ने स्टैंड अप इंडिया कार्यक्रम के लॉंन्च के मौके पर कहा कि इसकी बदौलत नौकरी मांगे वाले लोग अब नौकरियां देंगे. बहुत अच्छी सोच है स्वागत किया जाना चाहिए उनके इस कथन का. और इससे पूर्व शुरू की गई स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया, मुद्रा बैंक इन सब सुधारों को एक सूधारों के चक्र के रूप मे देखा जाना चाहिए, जिसका उद्देश्य सिर्फ भारत का उत्थान युवाओं को रोजगार और विश्व मे भारत को मजबूत बनाने की कोशिश है. लेकिन इन सब के बीच ऐसे बहुत से सवाल और समस्याए हैं जिन पर गौर किया जाना चाहिए. ये वो बाधाएं या चुनौतियां हैं जो न सिर्फ प्रशासनिक और आर्थिक हालातों के मद्देनजर उभरती हैं बल्कि बहुत हद तक सामाजिक सोच भी है जो कहीं न कहीं इन सुधारों की राह मे रोड़ा अटका सकती है. भारत में अभी भी सालाना 2 करोड़ 20 लाख व्यावसायिक दक्ष लोगों की जरूरत होती है जबकि इसके विपरीत हमारी सालाना आपूर्ति मात्र 43 लाख है 20 प्रतिशत से भी कम. यानी भारत के बाजार में भी वर्तमान समय में अपार संभावनाएं हैं. पढ़े-लिखे हुनरमंद नौजवानों के लिए, यानी हमें अभी भी अपना फोकस भारतीय बाजारों पर करना होगा, जहां आज भी अपार संभावनाएं हैं. अगर हम यहाँ मांग और आपूर्ति के बीच के फर्क को दूर कर पाए तो निसंदेह इसके बाद विश्व में भी हम अपनी अलग छाप छोड़ पाने मे संभव हो सकें. मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया से इस बात की अपार संभावनाएं हैं कि देश में बेरोजगारों की फौज पर काबू पाया जा सकता है. क्योंकि इन दोनों योजनाओं को सही तरीके से अमली जामा पहनाने से देश की तस्वीर बादल सकती है.

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