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Published on Sep 21, 16 |     Story by |     Total Views : 273 views

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साहस के साथ जवाब दे

पाकिस्तान ने जितनी तेजी से संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर के मुद्दे को उठाने की तैयारी की है और सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों से इसके समाधान की कोशिश करने की अपील की है, उससे लगता है कि या तो घाटी में ताज़ा विरोध प्रदर्शन और उड़ी में आतंकी हमला किसी व्यापक योजना का हिस्सा हैं या ये एक-दूसरे से जुडक़र योजना का निर्माण करते जा रहे हैं।


ALL-RIGHTS-SEPTEMBER-2016कश्मीर के उड़ी क्षेत्र में सैनिक शिविर पर आतंकी हमले ने भारत और पाकिस्तान के लगातार बिगड़ते संबंधों को ज्यादा खतरनाक दिशा में मोड़ दिया है। जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमला करने वालों को न छोडऩे का एलान किया है वहीं पाकिस्तान की तरफ से अस्तित्व का संकट आने पर परमाणु युद्ध की धमकी भी दी गई है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की भावना का प्रतिनिधित्व करते हुए राम माधव ने तो एक दांत के लिए पूरा जबड़ा उखाड़ लेने की सलाह दे डाली है। स्पष्ट है इस हमले के बाद दोनों देशों में वार्ता के समर्थक हाशिये पर चले गए हैं और परोक्ष या प्रत्यक्ष युद्ध के समर्थक प्रासंगिक हो गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगर कोई कड़ी कार्रवाई नहीं करते हैं तो उनकी सख्त प्रशासक की छवि को गहरा धक्का लगेगा और अगर म्यांमार सीमा की तरह आतंकी शिविरों पर कोई खुफिया कार्रवाई करते हैं तो उसकी तीखी प्रतिक्रिया के लिए भी तैयार रहना चाहिए। फिलहाल इस हमले के बाद कश्मीर घाटी में अलगाववाद की राजनीतिक समस्या के कश्मीरियत और इंसानियत के दायरे में समाधान की कोई पहल नहीं हो पाएगी।
अब सरकार का सारा ध्यान समस्या के बाहरी पक्ष की ओर जाएगा। इससे जहां सरकार की वह व्याख्या सही साबित होती दिखेगी कि समस्या बाहरी हस्तक्षेप के नाते है वहीं पाकिस्तान की उन ताकतों को फायदा होगा जो कश्मीर समस्या का अंतरराष्ट्रीयकरण चाहते हैं। अगर इस हमले के लिए जैश-ए-मोहम्मद जिम्मेदार है तो वह भी अमन वार्ता को धकियाने की कोशिशों में कामयाब तो होगा ही साथ ही समस्या के अंतरराष्ट्रीयकरण में भी सफल होगा। घाटी के मौजूदा असंतोष से बेचैन पाकिस्तानी सेना और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ दोनों के लिए यह मुफीद होगा। ऐसे में अब भारत के सामने तीन विकल्प बचते हैं। सबसे पहले पाकिस्तानी सरकार पर दबाव डालना चाहिए कि वह आतंकी संगठनों पर कार्रवाई करे। अगर वह ऐसा नहीं करती है तो भारत सरकार को इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाना चाहिए और पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित करवाने के साथ उसे अलग-थलग करने का प्रयास करना चाहिए। तीसरा विकल्प पाकिस्तान के आतंकी शिविरों पर खुफिया सैन्य कार्रवाई का है। भारत इन विकल्पों पर गंभीरता से विचार कर रहा है, जिसमें उसे संयम और दृढ़ता तो दिखानी ही चाहिए, लेकिन कार्रवाई करने में ज्यादा देर नहीं करनी चाहिए।
पाकिस्तान ने जितनी तेजी से संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर के मुद्दे को उठाने की तैयारी की है और सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों से इसके समाधान की कोशिश करने की अपील की है, उससे लगता है कि या तो घाटी में ताज़ा विरोध प्रदर्शन और उड़ी में आतंकी हमला किसी व्यापक योजना का हिस्सा हैं या ये एक-दूसरे से जुडक़र योजना का निर्माण करते जा रहे हैं। पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ बुधवार को निश्चित तौर पर घाटी के मौजूदा आंदोलन और भारत की चेतावनी को संयुक्त राष्ट्र में ऐसे उठाने जा रहे हैं कि कश्मीर समस्या हल नहींं हुई तो नाभिकीय युद्ध की आशंका है। वे जानते हैं कि भारत शिमला समझौते के तहत किसी तीसरे देश का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करेगा।
इसके अलावा शरीफ संयुक्त राष्ट्र के जिस प्रस्ताव का हवाला देकर हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं उसके बाद की स्थितियां काफी बदल चुकी हैं। पाकिस्तान ने पाक अधिकृत कश्मीर का एक हिस्सा चीन को दे दिया है और उसने वहां सडक़ निर्माण से लेकर सैन्य गतिविधियां तक चला रखी हैं। यानी जिन स्थितियों में कश्मीर में रायशुमारी हो सकती है वह पैदा करना आसान नहीं है। फिर भी अगर शरीफ इस मसले को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ला रहे हैं, तो इसकी वजह घरेलू राजनीति का वह दबाव है, जिसके तहत वे अन्य नेताओं की तरह जहां कश्मीर मुद्दे से अपनी कमजोर होती हैसियत बहाल करना चाहते हैं, वहीं हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को भरोसा देना चाहते हैं कि देखो मौका आने पर उन्होंने उनके लिए कुछ किया। बुरहान वानी के मारे जाने के बाद शरीफ की आमतौर पर खामोशी की वजह पनामा खुलासे में नाम आने के बाद सेना समेत तमाम लोकतांत्रिक संस्थाओं की नजऱ में उनकी हैसियत का घटना था।
इसके अलावा मोदी से उनकी बढ़ती निकटता भी सेना को पसंद नहीं थी। इसलिए पठानकोट हमले के बाद जांच और कार्रवाई का आश्वासन देने के बाद पलट जाना और उड़ी के हमले के बाद भारत की आक्रामकता देखकर उन्होंने जो रु ख अपनाया है, इसमें उन्हें अपनी सेना का समर्थन हासिल लगता है। जाहिर-सी बात है भारत को इस मोर्चे पर जहां सुषमा स्वराज के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र में राजनयिक जवाब देना होगा और आतंक को मुद्दा बनाना होगा, वहीं स्थानीय स्तर पर अपनी सुरक्षा के साथ उन ताकतों को नुकसान तो पहुंचाना ही होगा जो भारत को असुरक्षित व अस्थिर करना चाहती हैं।

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