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Published on Jun 18, 16 |     Story by |     Total Views : 361 views

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ताकि कल तक रहे जल…

देश के विशाल स्वरूप और मौसमी बरसात में विभिन्न कारणों से हो रही विभिन्नताओं को देखते हुए भारत के किसी भी भाग को सूखे की संभावना से अलग नहीं किया जा सकता। भारत के सूखा प्रभावित राज्यों में आंध्रप्रदेश, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और तामिलनाडु शामिल हैं। आपदा प्रबंधन के उचित उपायों से पिछले कुछ वर्षों में सिंचाई सुविधाओं में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। इसी तरह जंगलों की स्थिति में भी सुधार की स्थिति दिखती है।


coverकृतिक आपदाओं का सीधा संबंध पर्यावरण से है। लंबे समय तक जल की कमी को सूखे से उत्पन्न आपदा का प्रमुख कारण माना जा सकता है। बड़़े क्षेत्र में फैले अथवा दीर्घकालीन सूखा, भयानक प्राकृतिक आपदा के रूप में हमारे सामने आता है। जिससे कभी-कभी अकाल की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। सूखा एक मंद गति से उत्पन्न आपदा है, जो हमारे आर्थिक, औद्योगिक और सामाजिक क्षेत्र को कमजोर करता है। यह विकास प्रक्रिया को उलट देता है, स्वास्थ्य की समस्यायें उत्पन्न करता है, असामाजिक व्यवहार को जन्म देता है। यह हमारे मनोबल को कम करता है, प्रभावित लोगों को दूसरे क्षेत्रों में जाने को बढ़ावा देता है तथा इससे प्रभावित क्षेत्रों के अलावा आसपास के सूखे से अप्रभावित क्षेत्र भी इसके दुष्प्रभावों से अछूते

नहीं रहते।

सूखा सामान्यत: जल असंतुलन, कृषि, पशुधन अथवा मानव आवश्यकताओं को संतुष्ट करने में जल की कमी से उत्पन्न होता है। यह उन क्षेत्रों में हो सकता है जहाँ अपर्याप्त वर्षा होती है, तथा मिट्टी में, तथा वातावरण में पर्याप्त नमी का स्तर कम रहता है। सूखे का एक कारण उच्च तापमान से अत्यधिक वाष्पोत्सर्जन तथा मिट्टी की निम्न धारण क्षमता भी हो सकती है। लंबे समय तक पडऩे वाले सूखे से मिट्टी की जैविक, वानस्पतिक गतिविधियाँ पोषित नहीं हो पातीं जिससे मरुस्थल निर्माण भी हो सकता है।

भारत में सूखे की समस्या कई कारणों से आ सकती हैं। इसमें मुख्य हैं – दक्षिण पश्चिम मानसून का देरी से शुरू होना, मानसून में लंबी अवधि का अंतराल, मानसून का समय पूर्व समाप्त होना तथा देश के विभिन्न भागों में मानसूनी वर्षा का असमान वितरण। इसके अलावा इन प्राकृतिक क्रियाविधियों के अतिरिक्त मानवीय गतिविधियाँ भी, सूखे को बढ़ावा देने वाले प्रमुख कारण हो सकते हैं जैसे भू-उपयोग में परिवर्तन, अत्यधिक घास का चरना, अथवा वन कटाई तथा सूर्य की किरणों का विकिरण असंतुलन। इसके अलावा ग्लोबल वार्मिंग, ग्रीन हाउस प्रभाव जो मनुष्यों द्वारा निर्मित जलवायु परिवर्तन का कारण होती है, सूखा पडऩे के कारणों में से एक है। सूखे का हमारे जीवन में व्यापक प्रभाव पड़ता है। इसके प्राथमिक प्रभावों में फसल और कृषि उत्पादन की क्षति, पशुधन एवं जानवरों की क्षति, पीने और स्वच्छता, जल विद्युत उत्पादन तथा औद्योगिक उत्पादन में पानी की कमी शामिल हैं। इसी तरह अल्पकालीन एवं दीर्घकालीन प्रभावों में अकाल, मृत्यु एवं रोगों का फैलना, सामाजिक ताने बाने का तहस-नहस होना, मरुस्थलीकरण में वृद्धि, ग्रीन बेल्ट में कमी तथा मिट्टी का अपरदन मुख्य हैं। इन सब कारणों से स्थानीय झगड़ों और अशांति की घटनायें बढज़ाती हैं। शिक्षा का क्षेत्र भी सूखे के प्रति संवेदनशील होता है, तथा समुदाय एवं परिवार सूखे के दुष्प्रभावों से निपटने में पूरी तरह बिखर जाते हैं, जिसकी सामाजिक लागत को आंका नहीं जा सकता।

सूखे की आपदा की रोकथाम एवं न्यूनीकरण अच्छी प्रबंधन तकनीक के द्वारा संभव है। इसमें जल संसाधन प्रबंधन उन्नत करने, नये कुएँ बनाना या पुराने कुओं में सुधार, बांध बनाना, वाटरशेड प्रबंधन, जल वितरण नियंत्रण, सूखा रोधी फसलों का उचित चयन, पशु प्रबंधन एवं मिट्टी संरक्षण तकनीकें, ईंधन के लिये लकड़ी की कटाई एवं वनोन्मूलन को कम करना, लोगों को वैकल्पिक रोजगार दिलाना, लोगों के प्रवास को रोकना इत्यादि कार्य मुख्य हैं। इसके अलावा प्रभावित लोगों को शिक्षित, प्रशिक्षित एवं जागरुक बनाना, सामुदायिक कार्यक्रमों में सहभागिता, जल संसाधनों का उन्नत सिंचाई के तरीकों को अपनाना तथा पारिस्थितिकी तंत्र को बिना नुकसान पहुँचाये विकास योजनाओं को लागू करना, सूखे की आपदा को कम करने में सहायक होते हैं।

देश के विशाल स्वरूप और मौसमी बरसात में विभिन्न कारणों से हो रही विभिन्नताओं को देखते हुए भारत के किसी भी भाग को सूखे की संभावना से अलग नहीं किया जा सकता। भारत के सूखा प्रभावित राज्यों में आंध्रप्रदेश, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और तामिलनाडु शामिल हैं। आपदा प्रबंधन के उचित उपायों से पिछले कुछ वर्षों में सिंचाई सुविधाओं में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। इसी तरह जंगलों की स्थिति में भी सुधार की स्थिति दिखती है। लेकिन लगातार परिवर्तित जलवायु, प्रतिकूल, प्राकृतिक और कृत्रिम कारणों से हमें सूखे की समस्या से लडऩे के लिये हमेशा तैयार रहना पड़ेगा, जिसके लिये सरकार के साथ ही साथ हम सबको मिलकर सूखे के कारणों का पता कर इसकी रोकथाम और न्यूनीकरण की योजनाओं को लागू करना पड़ेगा ताकि हमारी भावी पीढ़ी, सूखे जैसी आपदाओं से मुक्त रहें।

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