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Published on Jun 18, 17 |     Story by |     Total Views : 47 views

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वनाधिकार कानून के विरोध में तंत्र

वन व अन्य प्राकृतिक संपदा पर वनाश्रित समुदायों के स्वतंत्र एवं पूर्ण अधिकार का विषय वनाधिकार आंदोलन में हमेशा से प्रमुख रहा है। अंग्रेजी राज के जमाने में ही इन संपदाओं पर उपनिवेशिक शासकों ने पूरा कब्जा जमा लिया और समुदायों का प्राकृतिक संपदा के साथ जो पारंपरिक रिश्ता है, उसमे दख़ल-अंदाजी कर उन्हें अपनी विरासत से बेदख़ल कर दिया गया। पिछली दो सदी से वनाधिकार आंदोलन समुदाय के सार्वभौमिक अधिकार को स्थापित करने के लिए चलता रहा और आज भी जारी है। अंग्रेजी शासनकाल की समाप्ति के बाद सत्तासीन हुई आजाद भारत की सरकार ने भी प्राकृतिक संपदा की इस लूट को बरकरार रखा और आर्थिक राजनैतिक ढांचे में किसी प्रकार के कोई भी बुनियादी परिवर्तन नहीं किए। यानि एक ऐतिहासिक अन्यायपूर्ण व्यवस्था आजाद भारत में भी चलती रही और इसके खिलाफ जनांदोलन के जरिये से वनाश्रित समुदाय भी अपनी मांग उठाते रहे। इन संघर्षो की आखिऱकार जीत हुई और आजादी के साठ साल बाद भारत की माननीय संसद ने ‘‘अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परम्परागत वननिवासी (अधिकारों की मान्यता) कानून यानि (वनाधिकार कानून)-2006 15 दिसम्बर 2006’’ को पारित किया। इस विशेष कानून का उद्ेश्य वनाश्रित समुदायों पर किए गए ऐतिहासिक अन्याय को खत्म करना और पर्यावरण की सुरक्षा में समुदायों की भूमिका को मजबूत करना है। इस ऐतिहासिक कानून के पारित होने पर वनाश्रित समुदायों में एक नई चेतना विकसित हुई और साथ-साथ एक विश्वास भी कि अब जल-जंगल-जमीन पर लोगों के मालिकाना अधिकार स्थापित होंगे। वनाधिकार कानून में मान्यता दिये गये तमाम अधिकारों में दो प्रमुख अधिकार हैं, एक वनक्षेत्र के अंदर जिस जमीन और जंगल पर लोग अपनी आजीविका चला रहे हैं उस पर और उनकी आवासीय जमीन पर मालिकाना अधिकार व दूसरा पूरे वनक्षेत्र में पहुंच और लघुवनोपज पर समुदाय का सामुदायिक मालिकाना अधिकार। जो कि समुदाय द्वारा चुनी गई ग्रामसभा ही तय करेगी जहां शासन-प्रशासन का किसी प्रकार का दख़ल नहीं होगा।

आज भी जमीनी स्तर पर इसका उल्टा हो रहा है। सरकारी तंत्र इस कानून के विरोध में काम कर रहा है। वर्तमान केन्द्र सरकार एक कदम आगे बढक़र पूरे कानून को ही बदलने की दिशा में काम कर रही है। लेकिन यह इतना आसान काम नहीं है। चूंकि वनाधिकार कानून एक विशिष्ट कानून है, इसको बदलने के लिए संसद में पास कराना जरूरी है। इस सच्चाई से बचने के लिए मौजूदा सरकार द्वारा नए-नए खतरनाक तरीकों को इस्तेमाल करना शुरू कर दिया गया है। जैसे कैंपा कानून लाकर वनाधिकार कानून के मुकाबले में कंपनियों को वृक्षारोपण के कार्यों में शामिल करना, चूंकि कैम्पा के तहत 43 हजार करोड़ की पूंजी है और जिस पूंजी के आधार पर वनक्षेत्र में वनाधिकार समितियों को निष्प्रभावी करना, एक तरह से वनक्षेत्रों में वनविभाग द्वारा पूंजीवादी व्यवस्था को स्थापित करके परंपरागत वन संरक्षण व्यवस्था को खत्म करना और बहुमूल्य वन एवं खनिज संपदा कम्पनियों को सौंपने में निश्चित रूप से वनक्षेत्रों में ग्रामसभा बनाम वनविभाग एवं कम्पनियों से सीधा टकराव शुरू हो चुका है। जिसके फलस्वरूप वनाधिकार कानून में प्राप्त वनभूमि से समुदायों को विस्थापित करने की प्रक्रिया शुरु हो गयी है और जंगलक्षेत्रों में नक्सलवाद की आड़ लेकर सलवाजुडूम और पी.आर.डी जैसी संस्थायें खड़ी की जा रही हैं, जिसमें समुदायों के हाथ समुदायों का कत्ल-ए-आम कराया जा रहा है।

समुदायों द्वारा वनाधिकार कानून नियमावली संशोधन-2012 के तहत किये गये व्यक्तिगत दावों को भी बिना किसी कानूनी अड़चन के लंबित किया जा रहा है। आदिवासी मंत्रालय द्वारा जारी किए गए आंकड़ों से यह साफ जाहिर होता है कि अभी तक कानून की किस प्रकार अनदेखी की गई है। देश में कुल मिला कर 41 लाख 71 हजार 788 दावे किए जा चुके हैं जिसमें से 17 लाख 20 हजार 742 व्यक्तिगत व केवल 62 हजार 520 सामुदायिक दावे का ही निष्पादन किया गया है। किए गए दावों में से भी 84.82 प्रतिशत ही निर्धारित किए गए है शेष को निरस्त कर दिया गया या लंबित  है। व्यक्तिगत दावों के तहत 136 लाख 12 हजार 921एकड़ पर एवं   95 लाख 45 हजार 386 एकड़ वनभूमि पर मालिकाना हक प्रदान किया गया है। रोमा मल्लिक का कहना है कि उत्तर प्रदेश पर अगर नजर डाले तो स्थिति बेहद ही दयानीय है प्रदेश में कुल 93 हजार 644 दावे ही किए गए जिसमें से केवल 18 हजार 555 दावों को ही निर्धारित किया गया है। इन दावों में से सबसे अधिकांश केवल एक ही जिले सोनभद्र से 90 हजार के है व बाकि अन्य जिलों से और सामुदायिक दावें केवल 843 ही है। अगर जांच पड़ताल की जाए तो प्राप्त दावापत्र में भी वास्तिक रूप से लोगों को आंशिक ही भौमिक अध्किार मिले हैं। जिला सहारनपुर में वनग्रामों के दावे अभी तक समाज कल्याण अधिकारी व उपजिलाधिकारी कार्यालय में ही पड़े सड़ रहे हैं। उत्तर प्रदेश  में यह आंकड़े बसपा सरकार के कार्याकाल के ही हैं उसके बाद इस कानून को लेकर उत्तर प्रदेश में किसी प्रकार की प्रगति नहीं हुई।

मध्यप्रदेश में भी वनाधिकार अधिनियम का ठीक तरह से अमल नहीं हो पा रहा है। जिन जनजातियों के पास पट्टे हैं, उन पर दबंगों का कब्जा है।चौहान के विधानसभा क्षेत्र बुधनी में 10 हजार से ज्यादा लोग भूमि का पट्टा पाने के लिए आवेदन दे चुके हैं, मगर उस पर अमल नही हो रहा है। मंडला जिले के जोगी सोढा ग्राम पंचायत के इंद्रावन वनग्राम में वनाधिकार कानून का माखौल उड़ाया जा रहा है। दरअसल वनों में रहने वाले भोले भाले आदिवासियों को शासन ने वनाधिकार के पट्टे के तहत इंदिरा आवास योजना से नवाज तो दिया लेकिन आवास की दूसरी किश्त के लिये इन लोगों को दर-दर की ठोकरें खाने को छोड़ दिया है। बताया जा रहा है कि एक साल पहले इन्द्रावन वनग्राम के 74 लोगों को जिला प्रशासन द्वारा इंदिरा आवास स्वीकृत कर आवास की पहली किश्त 24 हजार रुपये दिए गए, जिससे हितग्राहियों ने मटेरियल खरीद लिया और दूसरी किश्त 24 हजार मिलने के लालच में साहूकारों से ब्याज पर रुपये लेकर घर बनाना शुरू कर दिया। लेकिन न उनका घर बन पाया और न ही इन्हें आवास की दूसरी किश्त मिली। एक्टिविस्ट, लेखक और शोधकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग बताते हैं कि यदि खारिज किये गये दावों को राज्य स्तर पर देखें तो प्रतिशत के हिसाब से कर्नाटक पहले पायदान पर है, जहां 95.7 प्रतिशत दावों को खारिज किया गया है। राज्य में 1,97,246 निष्पादित दावों में से 1,88,943 दावों को खारिज कर दिया गया है। लेकिन यदि इसे तादाद के आधार पर देखें तो छत्तीसगढ़ इसमें सबसे आगे हैं, जहां 8,55,696 निष्पादित दावों में 5,07,907 दावों को खारिज कर दिया गया है। इसी तरह 6,08,930 निष्पादित दावों में से 3,74,732 खारिज दावों के साथ मध्यप्रदेश दूसरे स्थापन पर है और 3,40,980 निष्पादित दावों में से 2,30,732 खारिज दावों के साथ महाराष्ट्र तीसरे पायदान पर। इसमें एक गंभीर पहलू यह है कि वनाधिकारों का दावा उन्हीं राज्यों में सबसे ज्यादा खारिज किया गया है, जहां सबसे ज्यादा खनन कार्य चल रहा है या भविष्य में खनन की ज्यादा संभावनाएं हैं। क्या खनिज संपदा को कब्जा करने के लिए आदिवासी एवं अन्य वनाश्रित लोगों के अधिकारों को नाकारा जा सकता है? सामुदायिक अधिकार के सवाल पर वे कहते हैं कि भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा जारी एफआरए स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार 31 अगस्त 2016 तक देशभर में 1,12,051 सामुदायिक दावा पेश किया गया था, जिनमें से 47,443 सामुदायिक पट्टा शामिल है जबकि 64,608 दावों को खारिज कर दिया गया है, जो कुल दावा का 57.6 प्रतिशत है। छतीसगढ़, बिहार, केरल, राजस्थान एवं तमिलनाडु में सामुदायिक अधिकार के तहत एक भी पट्टा जारी नहीं किया गया है। असल में जंगलों पर सामुदायिक अधिकार नहीं देने का मूल कारण खनिज संपदा है क्योंकि अधिकांश खनिज जैसे लौह-अयस्क, बाक्साईट, कोयला इत्यादि जंगल या पहाड़ों में मौजूद है। सामुदायिक अधिकार को लेकर एक दिलचस्प मामला छत्तीसगढ़ से उभर कर सामने आया है। छतीसगढ़ के सूरजपुर जिले के परसाकेते गांव एवं सरगुजा जिले के घाटबर्रा गांव को निर्गत सामुदायिक पट्टा को रद्द कर राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड एवं अदानी मिनरल्स प्रा.लि. को कोयला खनन हेतु वनभूमि दे दिया गया। इसी तरह का मामला सारंडा जंगल का है जहां देश का 25 प्रतिशत लौह-अयस्क है जहां खनन कंपनियां 14,410.09 हेक्टेअर जंगल में खनन कार्य कर रही हैं। यहां 416 आदिवासियों को 315.74 एकड़ वनभूमि का व्यक्तिगत पट्टा निर्गत किया गया है तथा 415 दावों को दखल कब्जा नहीं होने का कारण बताकर खारिज कर दिया गया है। जबकि वहीं 22 नये खनन परियोजनाओं को 9,337.54 हेक्टेअर वनभूमि लीज पर दे दिया गया है। देश में इस तरह के उदाहरण भरे पड़े हैं, जहां आदिवासियों के अधिकारों को नाकारते हुए खनन कंपनियों को जंगलों को सौंपा जा रहा है।

शंकर गुहा नियोगी के साथ काम कर चुके और राजगोपाल पी.वी के जनादेश तथा जन सत्याग्रह में सक्रिय भागीदारी निभानेवाले सीताराम सोनवानी कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में वन अधिकार मान्यता पत्र के लिए आठ लाख से अधिक आवेदन आए थे, जिनमें केवल 40 प्रतिशत वन अधिकार मान्यता पत्रों का वितरण किया गया है और बाकी 60 फीसदी आवेदन निरस्त कर दिए गए हैं। यह शंकाओं को जन्म देता है, जिसकी समीक्षा करना जरूरी है। प्रदेश में कुल 12 हजार वन आश्रित गांवों में से केवल चार हजार गांवों को सामुदायिक वन अधिकार पत्र दिया गया है। कानून में विशेष पिछड़ी जनजातियों को बसाहट का अधिकार दिया गया है, लेकिन सरकार उन्हें अधिकार न देकर अन्याय कर रही है। ऐसे में आदिवासियों की अस्मिता, संस्कृति, आजीविका आदि सबकुछ खतरे में आ जाएंगे। आदिवासियों को उनका अधिकार न देना उनके हितों के साथ कुठाराघात होगा। पूरा सरकारी तंत्र व उसके सहयोगी जमींदार, भू-माफिया व अन्य निहित स्वार्थ भी पूंजीवाद के अधीन हैं। इसलिए चाहे वो केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकारें हों वह इस तरह के प्रगतिशील जनहितकारी कानून को लागू करने में किसी भी प्रकार की दिलचस्पी नहीं है। वनाधिकार कानून 2006 को पारित हुए ग्यारह साल पूरे हो चुके  हैं और ये स्पष्ट हो गया है कि वनाधिकार कानून लागू करना एक राजनैतिक संघर्ष है, चूंकि ये व्यापक रूप से भूमि अधिकार आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें करीब 4 करोड़ हैक्टेअर वनभूमि का आबंटन वनसमुदायों के लिये सामूहिक रूप से होना निर्धारित है। इसीलिये वनाधिकार आंदोलन में भूमि का सवाल भी अंतर्निहित है।

आदिवासी मंत्रालय द्वारा इस तथ्य को उजागर किया गया है कि वनों के अंदर वनसम्पदा पर समुदाय का हक न होने की वजह से वनाश्रित समुदाय घोर गरीबी की चपेट में है। आदिवासी मंत्रालय द्वारा यह कहा गया है कि वनोपज से सालाना आय मोटे रूप से अनुमानित 50 हजार करोड़ की है अगर यह राशि सीधे समुदाय के पास जाए तो उनकी जीवनशैली में काफी बदलाव आ सकते हैं व उनका विकास हो सकता है। सामुदायिक अधिकार के तहत देश में 7000 वनग्रामों को भी राजस्व ग्राम में तब्दील करने की मुहिम को तेज करना शामिल है।

कानून के अनुरूप वनसम्पदा व वनभूमि पर ग्राम सभा को ही मजबूत करने के प्रावधान है व इसमें शासन प्रशासन के हस्तक्षेप को समाप्त किया गया है। इसी प्रावधान के कारण उड़ीसा में नियमागिरी पहाड़ व समुद्र तट में पास्कों स्टील कंपनी को दिए जाने वाली भूमि को कंपनियों द्वारा बिना ग्राम सभा की अनुमति के लिए नहीं ली जा सकी।

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