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Published on Jul 13, 16 |     Story by |     Total Views : 323 views

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इस विस्तार के मायने क्या हैं

पंजाब में भाजपा अकाली दल के दामन से बंधी हुई है और उसका आधार गैर-सिखों में है, इसलिए बिहार के वासी और दार्जीलिंग के सांसद एसएस अहलूवालिया को मिलने वाला मंत्रिपद उनकी वरिष्ठता और प्रशासनिक तजुर्बे के खाते में ही जाता है। वैसे भी पंजाब के चुनाव की फिक्र करना अकाली दल का सिरदर्द ज्यादा है। विजय गोयल पिछले कुछ महीनों में दिल्ली भाजपा के सबसे संघर्षोन्मुख नेता रहे हैं।


July-201601करीबन छब्बीस महीने पहले नरेन्द्र मोदी ने जो टीम बनाई थी, उसके कामकाज से वे खुद खास संतुष्ट नहीं हैं। हालांकि, उन्होंने किसी बड़े मंत्री को निकालकर दंडित नहीं किया है, लेकिन उनका संदेश साफ है। अगर अगले छह महीने में मंत्रियों ने नतीजे दिखाने शुरू नहीं किए तो संभव है तीन साल खत्म होते-होते कइयों की छुट्टी हो जाए। तरक्की सिर्फ एक मंत्री को मिली है और इससे ज़ाहिर होता है कि मोदी से अपनी पीठ ठोकवाना कई मंत्रियों के लिए आसान नहीं रहा है। दूसरे, सरकार और भाजपा के भीतर राजनीतिक समीकरण अब पहले जैसे नहीं रह गए हैं। नए मंत्रियों में ऐसे भी हैं, जिनके बारे में समझा जाता था कि मोदी उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी देने के बारे में सपने में भी नहीं सोचेंगे, लेकिन इस बीच वफादारियां बदली हैं और नई निष्ठाओं को पुरस्कृत किया गया है। तीसरे, विस्तार को राज्यों के चुनावों के मद्देनजर देखें तो उत्तर प्रदेश में गैर-यादव पिछड़े वर्ग और उत्तराखंड में दलित वोटों की गोलबंदी का आग्रह नजऱ आ सकता है।
इस विस्तार से पहले मोदी कम से कम तीन बार ठोक-बजाकर देख चुके थे कि उनके मंत्रियों का काम कैसा है। पहले छह महीने गुजऱने पर उनकी तरफ से एक आकलन हुआ था, दूसरा आकलन पहला वर्ष पूरा होने पर और तीसरा अभी हफ्ते भर पहले संपन्न हुआ। ऐसे आकलनों का आधार राजनीतिक कम और तकनीकी ज्यादा होता है। देखा जाता है कि मंत्री ने अपने मंत्रिमंडल को दी गई धनराशि ठीक से खर्च की है या नहीं। कम खर्च करने वाले मंत्री कम सक्षम माने जाते हैं। जाहिर है नतीजा मिला-जुला ही होता है। सभी मंत्रियों की रपट नितिन गडकरी, पीयूष गोयल, अरुण जेटली और राजनाथ सिंह जैसी चमकदार नहीं हो सकती। लगता है कि प्रधानमंत्री ने किसी मंत्री को ‘निकाल देेने लायक’ खराब काम करने वाला नहीं माना। चूंकि आकलन में जिन बड़े मंत्रालयों के कामकाज पर सवालिया निशान लगे थे, उनमें सबसे ऊपर मानव संसाधन विकास मंत्रालय था, इसलिए प्रधानमंत्री को इस मंत्रालय का नेतृत्व बदलना पड़ा। उन्होंने इस मंत्रालय के राज्य मंत्री रमाशंकर कठेरिया को तो निकाल ही दिया। ज़ाहिर है कि यह मंत्रालय मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक रहा है। कठेरिया के बारे में माना जाता था कि कि उन्हें आरएसएस के कहने पर लाया गया है। वे शिक्षा में भगवाकरण के निसंकोच प्रवक्ता के रूप में उभर रहे थे, लेकिन उन्हें सांप्रदायिक वक्तव्य देने की सजा मिली है। अगर ऐसा होता तो उनके साथ-साथ गिरिराज सिंह, साध्वी निरंजन ज्योति और संजीव बालियान को पहले निकलना पड़ता। चूंकि साध्वी और बालियान को उत्तर प्रदेश के चुनाव के मद्देनजर नहीं निकाला जा सकता था, इसलिए भी कठेरिया को निकालने के पीछे यह तर्क नहीं हो सकता। बाकी जिन पांच मंत्रियों से इस्तीफा लिया गया है, वे राजनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण नहीं माने जाते। एक मात्र पदोन्नत मंत्री प्रकाश जावडेकर अटकी हुई नई परियोजनाओं को रिकॉर्ड समय में पर्यावरण स्वीकृति दे कर सरकार और कॉरपोरेट जगत के प्रिय पात्र बन चुके थे, अब उनके सामने स्मृति ईरानी द्वारा किए गड़बड़झाले को सुधारने की चुनौती है।
चुनावी राजनीति के लिहाज़ से अनुप्रिया पटेल का राज्य मंत्री बनना ‘काबिले-गौर है। लगता है कि अनुप्रिया को कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के भीतर हुए घटनाक्रम के कारण मंत्रिपद मिल गया। वरना, खुद उनकी पार्टी ‘अपना दल’ में उनकी स्थिति अच्छी नहीं थीं। उनकी मां ही उन्हें निष्कासित कर चुकी थीं। अगर सपा ने कांग्रेस से बेनी प्रसाद वर्मा को अपनी ओर खींचकर राज्यसभा का सांसद बनाने के जरिये कुर्मी वोटों को संदेश न दिया होता, तो अनुप्रिया को शायद यह मौका न मिलता। दूसरा चुनावी मंत्रिपद अजय टम्टा को मिला है। अगर कांग्रेस ने प्रदीप टम्टा को राज्यसभा सदस्य न बनाया होता, तो भाजपा शायद उत्तराखंड से अपने टम्टा को मंत्रिपरिषद में लाने के बारे में न सोचती। ब्राह्मण-ठाकुर बहुतायत वाले उत्तराखंड में दलित वोटों की यह मारामारी बताती है कि अगला चुनाव वहां किस शिद्दत से लड़ा जाएगा। पंजाब में भाजपा अकाली दल के दामन से बंधी हुई है और उसका आधार गैर-सिखों में है, इसलिए बिहार के वासी और दार्जीलिंग के सांसद एसएस अहलूवालिया को मिलने वाला मंत्रिपद उनकी वरिष्ठता और प्रशासनिक तजुर्बे के खाते में ही जाता है। वैसे भी पंजाब के चुनाव की फिक्रकरना अकाली दल का सिरदर्द ज्यादा है। विजय गोयल पिछले कुछ महीनों में दिल्ली भाजपा के सबसे संघर्षोन्मुख नेता रहे हैं। शायद भाजपा गोयल को केजरीवाल से सडक़ों पर भिडऩे वाले नेता के रूप में देख रही है। लेकिन फिर तो उन्हें पार्टी की अध्यक्षी वापस मिलनी चाहिए थी, जो हर्षवर्धन के लिए उनसे छीनी गई थी। मंत्री के रूप में तो वे दिल्ली की राजनीति में सक्रिय नहीं रह पाएंगे।

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