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Published on Jun 28, 17 |     Story by |     Total Views : 65 views

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वाटर फुटप्रिंट ही तीसरे विश्वयुद्ध से बचाएगा

क्या है वाटर फुटप्रिंट

वाटर फुटप्रिंट शब्द सुनते ही सबसे पहला सवाल यही दिमाग में आता है कि वाटर  फुटप्रिंट है क्या? हमारे प्रतिदिन के बहुत से उत्पादों में आभासी या छुपा जल शामिल होता है. उदाहरण के लिए, एक कप कॉफी के उत्पादन के लिए आभासी पानी की मात्रा 140 लीटर तक होती है. आपका वाटर  फुटप्रिंट केवल आपके द्वारा प्रयोग किए गए प्रत्यक्ष पानी (उदाहरण के लिए, धुलाई में) को ही नहीं दिखाते, बल्कि आपके द्वारा उपभोग किए गए आभासी पानी की मात्रा को भी दर्शाता है.


water footprintदो  आकड़े हैं. एक 1951 का और दूसरा 2001 का. भारत में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता जहां 1951 में 14180 लीटर थी, वो अब 5120 लीटर हो गई है. साल 2025 तक यह उपलब्धता घट कर करीब 3 हजार लीटर रह जाएगी, तो सवाल है कि फिर क्या होगा? दुनिया भर में कार्बन की खपत की मात्रा क्या है, इसकी जानकारी के लिए दुनिया भर में कार्बन फुटप्रिंट का इस्तेमाल किया जाता है. इसी तरह, मानवीय हस्तक्षेप के कारण पानी की खपत कहां और कितनी हो रही है, इसे जानने के लिए आजकल एक नई अवधारणा प्रचलन में है, जिसका नाम है वाटर फुटप्रिंट. वाटर फुटप्रिंट बताता है कि आप अपनी जिन्दगी में हर दिन किन स्त्रोतों से कितने पानी की खपत कर रहे है.

मिनरल वाटर, कोल्ड ड्रिंक और पानी

सबसे पहले हम बात करते हैं बोतलबन्द पानी की. पिछले बीस सालों में भारत में बोतलबन्द पानी  के व्यापार में जो तेजी और तरक्की आई है, वो आश्चर्यजनक है. क्या आपकों पता है कि जब आप एक बोतल पानी खरीद कर पीते हैं, तब आप उस पानी को कितनी कीमत पर खरीदते हैं और इसके  साथ ही आप कितना लीटर पानी बर्बाद कर देते हैं. शायद, आपको यह डाटा देख कर भरोसा न हो. लेकिन यही सच है और यह सच ऐसा है जो हमें दिनोंदिन पानी के संकट की ओर धकेल रहा है. मसलन, एक लीटर बोतलबंद पानी तैयार करने में पांच लीटर पानी खर्च होता है. एक डाटा के मुताबिक दुनिया भर में साल 2004 में 154 अरब लीटर बोतलबंद पानी के लिए 770 अरब लीटर पानी का उपयोग किया गया था. भारत में भी ऐसी प्रक्रिया के लिए 25.5 अरब लीटर पानी बहाया गया. यह अकारण ही नहीं है कि बनारस से ले कर केरल के गांववाले इन बोतलबन्द कंपनियों और कोला कंपनियों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं. कैलिफोर्निया के पेसिफिक इंस्टीट्यूट का कहना है कि 2004 में अमेरिका में 26 अरब लीटर पानी की पैकिंग के लिए प्लास्टिक की बोतलें बनाने के लिए दो करोड़ बैरल तेल का इस्तेमाल किया गया. प्लास्टिक की बोतलें भी भूजल को प्रदूषित करती है और ग्लोबल वार्मिंग का भी कारण बनती है.

कृषि और पानी

कुछ दिलचस्प लेकिन खतरनाक डाटा पर नजर डालते हैं. कृषि एक ऐसा क्षेत्र है, जहां पूरे पानी का करीब 90 फीसदी से भी ज्यादा का इस्तेमाल होता है. घरेलू  इस्तेमाल मेें पानी का सिर्फ 5 फीसदी ही खर्च होता है. इसके अलावा, भारत में एक किलो गेहूं उगाने के लिए करीब 1700 लीटर पानी खर्च होता है. यानी, अगर हमारे परिवार में एक दिन एक किलो गेहूं की खपत होती है, तो हम उसके साथ करीब 1700 लीटर पानी की भी खपत करते हैं. यहां तक कि आप जो कंप्यूटर, कार का इस्तेमाल करते हैं या फिर जो जींस पैंट पहनते हैं, उसमें भी हजारों लीटर पानी की खपत हुई होती है या फिर एक कप कॉफी के साथ हम असल में 140 लीटर पानी भी पीते हैं, लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर. इसे आप आभासी खपत कह सकते है लेकिन यह खपत असली है.

आज, मिस्र दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है, जो गेहूं आयात करता है और चीन भी अब खाद्य उत्पादों का बड़ा आयातक बन गया है, जबकि दुनिया भर में इसके सामान बिकते हैं. सवाल है कि चीन या मिस्त्र ऐसा क्यों कर रहे हैं. जवाब बहुत ही साधारण है. इन दोनों देशों ने ऐसे सभी फसलों का उत्पादन बहुत ही कम कर दिया है, जिसमें पानी की खपत सबसे ज्यादा होती है. ये दोनों देश इस तथ्य के बावजूद ऐसा कर रहे हैं कि इनके  पास पानी की फिलहाल कोई भारी कमीं नहीं है और इनके पास नील और व्हांगहो जैसी नदियां भी हैं. दरअसल, ऐसा सिर्फ और सिर्फ पानी बचाने के लिए हो रहा है. कोई देश पानी बचाने के लिए फसल ही न उगाए और उसकी जगह उसे दूसरे देशों से आयात करे, तो इससे समझा जा सकता है कि जल संकट को ले कर दुनिया में क्या चल रहा है?

भारत के सन्दर्भ में देखें तो, इसका क्या मतलब है? इसे ऐसे समझ सकते हैं कि साल 2014-15 में भारत ने करीब 37 लाख टन बासमती चावल का निर्यात किया. अब 37 लाख टन बासमती चावल उगाने के लिए 10 ट्रिलियन लीटर पानी खर्च हुआ. इसे अब ऐसे भी बोल सकते हैं कि भारत ने 37 लाख टन बासमती के साथ 10 ट्रिलियन लीटर पानी भी दूसरे देश में भेज दिया, जबकि पैसा सिर्फ चावल का मिला. यानी, जिस देश ने हमसे चावल खरीदा उसे चावल के साथ दस ट्रिलियन लीटर पानी निशुल्क में मिल गया या फिर कहे कि उसका इतना ही पानी बच गया. भारत हर साल विदेशों में अनाज बेच कर भारी मात्रा में पानी का आभासी निर्यात करता है.

क्या है वाटर फुटप्रिंट

वाटर फुटप्रिंट शब्द सुनते ही सबसे पहला सवाल यही दिमाग में आता है कि वाटर  फुटप्रिंट है क्या? हमारे प्रतिदिन के बहुत से उत्पादों में आभासी या छुपा जल शामिल होता है. उदाहरण के लिए, एक कप कॉफी के उत्पादन के लिए आभासी पानी की मात्रा 140 लीटर तक होती है. आपका वाटर  फुटप्रिंट केवल आपके द्वारा प्रयोग किए गए प्रत्यक्ष पानी (उदाहरण के लिए, धुलाई में) को ही नहीं दिखाते, बल्कि आपके द्वारा उपभोग किए गए आभासी पानी की मात्रा को भी दर्शाता है. लोग पीने, खाना पकाने और कपड़े धुलने के लिए पानी का इस्तेमाल करते है. लेकिन, इससे अधिक पानी वे अनाज उपजाने, कपडे का निर्माण करने, कार बनाने और कंप्यूटर बनाने में करते हैं. वाटर  फुटप्रिंट ऐसे ही हर एक उत्पाद और सेवा, जिसका हम उपभोग करते हैं, उसमें इस्तेमाल किए गए पानी की गणना करता है. वाटर  फुटप्रिंट हमारे सामने कई सारे सवाल उठाता है. जैसे, किसी कंपनी में इस्तेमल किए जाने वाले पानी का स्त्रोत क्या है? इन जल स्त्रोतों की रक्षा के लिए क्या उपाय है? क्या हम वाटर  फुटप्रिंट घटाने के लिए कुछ कर सकते हैं?

वाटर  फुटप्रिंट के तीन घटक हैं. ग्रीन, ब्लू और ग्रे. एक साथ मिल कर ये घटक पानी इस्तेमाल की असल तस्वीर दिखाते हैं. मसलन, इस्तेमाल किया पानी बारिश का पानी है, सतह का पानी है या भू-जल है. वाटर  फुटप्रिंट किसी प्रक्रिया, कंपनी या क्षेत्र द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पानी की खपत और जल प्रदूषण को बताता है. ग्रीन वाटर  फुटप्रिंट मिट्टी की परत में छुपा पानी है, जसका इस्तेमाल कृषि, हार्टीकल्चर या जंगल द्वारा होता है. ब्लू वाटर  फुटप्रिंट ग्राउंड वाटर है. इसका इस्तेमाल कृषि, उद्योग और घरेलू काम में होता है. ग्रे वाटर  फुटप्रिंट ताजा जल (फ्रेश वाटर) की वह मात्रा है जिसकी जरूरत प्रदूषक हटा कर जल की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के लिए होती है. वाटर  फुटप्रिंट का संबंध फ्रेश वाटर (ताजा जल) पर मानवीय प्रभाव और मानवीय इस्तेमाल से है. फुटप्रिंट के जरिए पानी की कमी और जल प्रदूषण जैसे मुद्दे को भी समझा जा सकता है. पानी का संकट आज वैश्विक अर्थव्यवस्था से भी संबंधित है. कई देशों ने तो अब अपने वाटर  फुटप्रिंट को कम करने के लिए ऐसे उत्पादों को दूसरे देश से मंगाना शुरु कर दिया है, जिसके उत्पादन में पानी का ज्यादा इस्तेमाल होता है. तो क्या अब यह जांचने का वक्त नहीं आ गया है कि हमारा वाटर फुटप्रिंट क्या है? क्या हम भी अपना वाटर फुटप्रिंट नहीं घटाएंगे?

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