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Published on Apr 19, 17 |     Story by |     Total Views : 63 views

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ये जीत भाजपा के विजन की है

पांच राज्यों के चुनाव नतीजों से कई चीजें साफ हुई हैं। बीजेपी की जीत दरअसल एक विजन की जीत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता के सामने भारत के विकास का एक ठोस विजन पेश किया है, जिसे लोगों ने एक बार फिर खुलकर समर्थन दिया है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी देश के विकास और जनता की खुशहाली के लिए अपना अलग नजरिया लेकर आए। वे जनता को सपने दिखाने और उसमें उम्मीद जगाने में सफल रहे। यही वजह है कि उन्हें जनता ने देश का नेतृत्व सौंप दिया। उसके बाद से अब तक के कार्यकाल में वे अपने उस नजरिए के अनुरूप ही कार्य करते रहे हैं। लोगों को उनकी मंशा पर संदेह नहीं है। भले ही अभी कोई असाधारण उपलब्धि हासिल न की गई हो, पर जनता को लगता है कि उस नजरिए से उनके सपने साकार हो सकते हैं, यानी उस विजन में संभावनाएं अब भी नजर आ रही हैं। यही वजह है कि जनता ने जाति, धर्म और दूसरे समीकरणों से ऊपर उठकर इस विजन को सपोर्ट किया। अगर ऐसा नहीं होता तो यूपी में बीजेपी को तीन सौ से ज्यादा सीटें नहीं मिलतीं। यह इस बात का संकेत है कि मतदाता अपनी परंपरागत सोच से बाहर आ रहा है।

दरअसल मतदाताओं का चरित्र भी बदला है। महिलाएं बड़ी संख्या में वोट दे रही हैं। अब वे कुनबे और परिवार के दबाव से मुक्त होकर निर्णय कर रही हैं। युवाओं का एक नया वोटर क्लास सामने आ गया है जो अलग तरीके से सोचता है। उन सबको विकास चाहिए स्थायित्व चाहिए। वे केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार होने के महत्व को समझते हैं। इसलिए अब सिर्फ सोशल इंजीनियरिंग कारगर नहीं होने वाली। एक विजन को एक वैकल्पिक विजन से ही हराया जा सकता है सियासी गणित से नहीं। जब तक कामकाज का, विकास का कोई ठोस वैकल्पिक अजेंडा लेकर कोई पार्टी नहीं आएगी, जनता उस पर विश्वास नहीं करेगी। यह बात गैर बीजेपी दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। योगी आदित्यनाथ के चयन के जरिए एक खास संदेश दिया दिया, एक विशेष रणनीति का आधार रखा गया है। उनके साथ केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा को डेप्युटी सीएम बनाए जाने का भी अपना एक मकसद है। लेकिन जनता के लिए ये बातें कोई खास मायने नहीं रखतीं। यह ठीक है कि योगी आदित्यनाथ की छवि पारंपरिक राजनेताओं से नहीं मिलती। उनकी भाषा-शैली लोकतांत्रिक मुहावरे को छोड़कर चलती है। शायद इसीलिए उनका नाम सामने आते ही कुछ तबकों में हैरानी देखी गई। लेकिन किसी को यह ध्यान नहीं रहा कि योगी आज से राजनीति में नहीं है। वह वर्ष 1998 से लगातार सांसद बने हुए हैं और उत्तर प्रदेश के लिए उनका चेहरा जाना-पहचाना है।

बहरहाल, यूपी के लोगों को इससे मतलब नहीं कि बीजेपी योगी के जरिए कौन सा दांव खेलना चाहती है। उन्हें तो इस बात की प्रतीक्षा है कि नए मुख्यमंत्री आएं और कुछ कड़े फैसले करें। यूपी की जनता चाहती है कि राज्य जड़ता से बाहर निकले। आखिर वह भी देख रही है कि किस तरह आसपास के राज्यों ने तरक्की की है। वह भी अपने राज्य को एक आधुनिक विकसित प्रदेश के रूप में देखना चाहती है। पिछले कुछ वर्षों में विकास के नाम पर थोड़ा बहुत काम वेस्टर्न यूपी के कुछेक जिलों में हुआ है। पूरब का क्षेत्र, जहां से खुद आदित्यनाथ आते हैं, अब भी बदहाल और पिछड़ा है। वहां वर्षों से न तो कोई नया कारखाना लगा है न कोई नई परियोजना शुरू हुई है। उस इलाके के बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। वहां अक्सर महामारी फैल जाती है। वहां से बड़ी संख्या में नौजवानों का पलायन हो रहा है। ऊपर से राज्य में अपराध का बोलबाला है। कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ी हुई है। आए दिन दंगे-फसाद होते रहते हैं। जाहिर है, लोग इन सब से बाहर आना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने बड़ी उम्मीद के साथ मोदी के विकास के अजेंडे के पक्ष में खुलकर जनादेश दिया है। इस जनादेश का सम्मान इसी तरह होगा कि समाज के हरेक तबके को सुकून के साथ शिक्षा, रोजी-रोजगार के अवसर और सम्मानपूर्ण जीवन की गारंटी मिले। योगी आदित्यनाथ अपनी परंपरागत छवि से निकलकर यह कर सके तो न सिर्फ राज्य के लिए बल्कि देश के लिए बड़ी बात होगी।

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